Bihar Election Result Analysis: बिहार की जनता ने इस बार जातिगत राजनीति से उपर उठकर मतदान किया. मतदान का संदेश साफ है कि यह Mandate Prospective है जो बिहार की जनता ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी को RJD और JDU से अलग चिराग पासवान (लोजपा-आर), जीतन राम मांझी (हम) और उपेंद्र कुशवाहा (आरएलएम) की पार्टी के साथ मिलकर अगले पांच साल सरकार चलाने के लिए दिया है.
दरअसल पिछले 30 वर्षो में लालू और नीतीश ने कांग्रेस (Congress) और बीजेपी (BJP) के साथ मिलकर बिहार की जनता को यह समझाने का काम किया कि अगर जनता ने राष्ट्रीय पार्टियों (कांग्रेस और भाजपा) के हाथ में प्रदेश की कमान सौंपी तो राज्य का विकास ठप्प हो जाएगा.
कभी लालू यादव ने नारा दिया था कि भूराबाल ( भूमिहार, राजपूत , ब्राह्मण और लाला ( कायस्थ) को साफ करो. सवर्णों के सारे नेता लालू के राज में मार दिए गए और नीतीश ने बिहार की जनता का डीएनए टेस्ट (DNA test) कराने के नाम पर नाखून कटवाकर सवर्णों के नेताओं को शहीद करा दिया. इस गंदी राजनीति से परेशान होकर बिहार की जनता ने इस कदर मतदान किया कि अब प्रशांत किशोर (PK) जैसे Poll strategist भी यह नहीं समझ रहे हैं कि वो जाएं तो जाएं कहां ?
नीतीश का अवसान काल!
हालांकि नीतीश कुमार की पार्टी जदयू 85 सीटों के साथ प्रदेश की दूसरी बड़ी पार्टी है लेकिन अब सुशासन बाबू का मन , मस्तिष्क और मिजाज प्रदेश की बागडोर संभालने की स्थिति में नहीं है. वैसे वो मुख्यमंत्री की कुर्सी खुद छोड़ेगें, उसपर भाजपा को यकीन हो सकता है कम से कम मुझे तो यकीन नहीं होता. अगर आंकड़ों की बात करें तो नीतीश अभी भी तेजस्वी के साथ मिलकर सरकार बना सकते हैं लेकिन कितने दिन चलेगी उसकी कोई गारंटी नहीं है . मेरा मानना है कि यह समय बिहार की राजनीति में नीतीश और लालू दोनों के अवसान का काल है.
कांग्रेस का टूटना तय!
इस विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 06 सीटें मिली हैं, यकीन मानिए. नवंबर-दिसंबर 2026 या उससे पहले पार्टी के 4 विधायक भाजपा में चले जाऐंगे. बाकी 2 मुस्लिम विधायक नीतीश या फिर लालू की पार्टी में बाकी जाएंगे. बचे लोग राहुल गांधी को फॉलो करेंगे.
2027 मार्च तक बिहार में भाजपा!
अगर नीतीश जी मान गए तो ठीक और अगर नहीं माने तो मार्च 2027 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद सुसाशन बाबू को मुख्यमंत्री के पद से हटा दिया जाएगा. जैसा मैंने कहा कि 2025 का Mandate Prospective है जो बिहार की जनता ने नरेंद्र मोदी को बगैर लालू और नीतीश के सरकार चलाने के लिए दिया है, और अगर भाजपा ने इस जनादेश का निरादर किया तो जो हाल राजद का 2025 में हुआ है. वहीं हाल बिहार में बीजेपी का हो सकता है.
पीके की राजनीति बाकी !
प्रशांत किशोर बहुत अभिमानी हैं. उनकी पसंद और नापसंद में अभिमान की झलक है, लेकिन उनकी उम्र राजनीति के हिसाब से अभी काफी कम है. शुरूआत अच्छी नहीं है, लेकिन यह मत भूलिए कि 1984 के चुनाव में पूरे देश में भाजपा को मात्र 02 सीटें मिली थी. पीके को फिलहाल चुनिंदा पत्रकारों के चंगुल से बाहर निकलकर चौथे स्तंभ के संपूर्ण ईकाई को साथ लेकर सरकार के खिलाफ कूच करना पड़ेगा, वर्ना पार्टियां तो कई बनी और कब समाप्त हो गईं, यह पार्टी बनाने वाले को ही पता नहीं चला .
जदयू में भाजपा के रहनुमा!
नीतीश कुमार को मालूम है कि भाजपा के कम से कम 10 लोग जदयू के चुनाव चिन्ह पर जीत कर आए हैं. अगर सुशासन बाबू ने इस बार पलटी मारने की कोशिश की तो 10 विधायक गुलाटी मारकर या तो बीजेपी में चले जाऐंगे या फिर अपनी सदस्यता से इस्तीफा दे देंगे. इसलिए देश की जनता को मान लेना चाहिए कि अब समय Regional पार्टी का नहीं रहा.
-भारत एक्सप्रेस
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