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2009 के US दस्तावेज़ ने मचाई खलबली! क्या UPA सरकार ने भारत के सिविल न्यूक्लियर प्रोग्राम को कर दिया था IAEA के हवाले?

2008 की भारत-अमेरिका न्यूक्लियर डील पर 2009 के अमेरिकी दस्तावेज़ ने नई बहस छेड़ दी है. दस्तावेज़ में भारत के सिविल न्यूक्लियर प्रोग्राम को IAEA safeguards में रखने की प्रतिबद्धता का उल्लेख है. पढ़ें पूरी खबर..

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2009 US document on India civil nuclear program:  2008 की भारत-अमेरिका सिविल न्यूक्लियर डील को उस समय की UPA सरकार ने ऐतिहासिक बताते हुए खूब गुणगान किया था. लेकिन अब 2009 के एक अमेरिकी दस्तावेज़(India Safeguards Agreement) के सामने आने पर इसकी पूरी तरीके से पोल खोल कर रख दी है. यह मामला सोशल मीडिया पर कुछ लोगों द्वारा शेयर करने के बाद सामने आया है. दस्तावेज़ में कहा गया कि भारत ने अपनी मिलिट्री और सिविल परमाणु गतिविधियों को अलग करने और अपने सिविल न्यूक्लियर प्रोग्राम को IAEA सेफगार्ड्स के तहत रखने की प्रतिबद्धता जताई थी. इसी पंक्ति को लेकर अब राजनीतिक और रणनीतिक बहस तेज हो गई है. बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह “कंट्रोल सौंपना” था या सिर्फ अंतरराष्ट्रीय निगरानी की व्यवस्था?

क्या कहता है अमेरिकी दस्तावेज़?

24 जुलाई 2008 को IAEA में अमेरिका के स्थायी प्रतिनिधि ग्रेगरी एल. शुल्टे के बयान में कहा गया है कि भारत ने अपने सिविल और मिलिट्री न्यूक्लियर कार्यक्रम को अलग करने और सिविल सुविधाओं को IAEA safeguards के तहत रखने का वादा किया है. यह बयान अमेरिका-भारत नागरिक परमाणु सहयोग पहल के समर्थन में दिया गया था. दस्तावेज़ में इसे भारत को “अप्रसार की मुख्यधारा” में लाने का कदम बताया गया. यानी भारत, बिना NPT पर हस्ताक्षर किए, वैश्विक परमाणु व्यवस्था के ढांचे में शामिल हो रहा था. इसके तहत भारत के 14 सिविल रिएक्टर्स IAEA निरीक्षण के अधीन आ गए.

IAEA सेफगार्ड्स: कंट्रोल या निगरानी?

IAEA सेफगार्ड का मतलब यह होता है कि जिन रिएक्टरों को भारत ने “सिविल” घोषित किया, वे अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण के तहत रहेंगे ताकि उनका उपयोग हथियार निर्माण में न हो. हालांकि यह भी बता दें कि परमाणु हथियार वाले मिलिट्री न्यूक्लियर प्रोग्राम भारत के पूर्ण नियंत्रण में ही रहा. लेकिन सिविल रिएक्टरों पर निगरानी स्थायी (permanent safeguards) मानी जाती है, जिसे वापस लेना आसान नहीं होता. इसी बिंदु को लेकर विरोधी दलों ने तब भी संप्रभुता पर सवाल उठाए थे.

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UPA सरकार ने थपथपाई थी अपनी पीठ

UPA सरकार ने इसे ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक स्वीकृति की दिशा में बड़ा कदम बताया था. उनके मुताबिक, डील के बाद भारत को अंतरराष्ट्रीय न्यूक्लियर मार्केट तक पहुंच मिली, यूरेनियम आयात संभव हुआ और NSG से विशेष छूट मिली.

हालांकि उस समय विपक्ष में रही वर्तमान पार्टी ने इसे रणनीतिक झुकाव और दीर्घकालिक निर्भरता बताया था. आज 2009 के अमेरिकी दस्तावेज़ की पंक्तियां फिर उसी बहस को जिंदा कर रही हैं कि क्या यह समझौता भारत के हित में था या उसने सिविल कार्यक्रम को स्थायी अंतरराष्ट्रीय निगरानी में डाल दिया?

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-भारत एक्सप्रेस



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