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BHU के हिंदी विभाग पर ABVP का आरोप, EWS के नाम पर घोटाला…विश्वविद्यालय बना माओवादी मानसिकता की प्रयोगशाला

एबीवीपी का कहना है कि हिन्दी विभाग में ईडब्ल्यूएस आरक्षण के नाम पर दो पात्र छात्रों को जानबूझकर प्रवेश से वंचित किया गया. इस घोटाले को लेकर विभाग की ओर से कोई पारदर्शिता नहीं बरती गई.

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में शोध प्रवेश प्रक्रिया को लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने आरक्षण के नाम पर घोटाले का आरोप लगाते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन और विभागीय जिम्मेदारों पर तीखा प्रहार किया है.

एबीवीपी का कहना है कि यह मामला सिर्फ विभागीय लापरवाही नहीं, बल्कि गहरी साजिश का हिस्सा है, जिसमें माओवादी मानसिकता वाले शिक्षा विरोधी तत्व सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं. हिन्दी विभाग में ईडब्ल्यूएस आरक्षण के नाम पर दो पात्र छात्रों को जानबूझकर प्रवेश से वंचित किया गया. इस घोटाले को लेकर विभाग की ओर से कोई पारदर्शिता नहीं बरती गई और अब यह मामला विश्वविद्यालय की यूएसीबी समिति के समक्ष लंबित है. ABVP का आरोप है कि कुछ राजनीतिक दलों और शिक्षा विरोधी ताकतों ने इस मुद्दे को जानबूझकर भ्रमित करने की कोशिश की और ABVP के कार्यकर्ताओं को बदनाम करने का सुनियोजित प्रयास किया.

ABVP ने बीएचयू इकाई मंत्री भास्करादित्य त्रिपाठी को बदनाम करने के लिए चलाए जा रहे सोशल मीडिया दुष्प्रचार की कड़ी निंदा की. एबीवीपी ने कहा कि यह हमला केवल एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि छात्र अधिकारों की रक्षा के लिए खड़े हर छात्र की आवाज को कुचलने की कोशिश है. परिषद ने चेताया कि वह दुष्प्रचार का जवाब आंदोलन से देगी.

ABVP ने रखी चार मांगें

एबीवीपी ने विश्वविद्यालय प्रशासन से चार प्रमुख मांगें रखी हैं. इनमें ईडब्ल्यूएस आरक्षण में हुए घोटाले की निष्पक्ष जांच, दोषी शिक्षकों और अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई, ईडब्ल्यूएस से जुड़े नियमों पर भारत सरकार की गाइडलाइन के अनुसार तत्काल निर्णय लेना और विश्वविद्यालय परिसर को शिक्षा विरोधी राजनीतिक गतिविधियों से मुक्त कराना शामिल है.

एबीवीपी ने दो टूक कहा है कि यदि प्रशासन समय रहते निर्णायक कार्रवाई नहीं करता, तो छात्र हित में ABVP को संघर्ष का रास्ता अपनाना होगा. काशी प्रांत मंत्री अभय प्रताप सिंह ने कहा, “हिन्दी विभाग में जो कुछ हो रहा है, वह सिर्फ अकादमिक लापरवाही नहीं, बल्कि विचारधारा की लड़ाई है. कुछ लोग विश्वविद्यालय को माओवादी मानसिकता की प्रयोगशाला बनाना चाहते हैं. बीएचयू विद्या का मंदिर है, न कि विचारधारा थोपने का मंच.”

इकाई अध्यक्ष प्रशांत राय ने स्पष्ट कहा, “यह लड़ाई केवल दो छात्रों की नहीं है, यह पूरी शोध प्रक्रिया की शुचिता की लड़ाई है. यदि विश्वविद्यालय दबाव में निर्णय लेता है, तो इसका अर्थ है कि बीएचयू की आत्मा को गिरवी रख दिया गया है. एबीवीपी इसे किसी कीमत पर स्वीकार नहीं करेगी.”

ःभारत एक्सप्रेस



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