लोकसभा में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने देश में वामपंथी उग्रवाद यानी नक्सलवाद को खत्म करने की दिशा में सरकार की कोशिशों पर विस्तार से चर्चा की. उन्होंने नक्सलवाद के असली चेहरे को उजागर करते हुए कहा कि नक्सली आदिवासी नेताओं जैसे तिलका मांझी, भगत सिंह या सुभाष चंद्र बोस को अपना आदर्श कभी नहीं मानते थे. उनका आदर्श माओ था. शाह ने साफ कहा, ‘यहां तक कि अपने आदर्शों के चयन में भी ये विदेशों से आयातित विचारों का सहारा लेते हैं.’
अमित शाह ने जोर देकर कहा कि भारत एक लोकतंत्र है और हमने इस देश के संविधान को अपनाया है. उन्होंने कहा ‘यह सरकार किसी की धमकियों में नहीं आएगी. हमारा मकसद सिर्फ यही है कि हर नागरिक के साथ न्याय हो.’
शाह ने 1969 में स्थापित कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) की भी ओर इशारा किया. उन्होंने बताया कि इस पार्टी का उद्देश्य न राष्ट्र का विकास था और न ही नागरिकों के अधिकारों की रक्षा. बल्कि उनका लक्ष्य चीन और रूस जैसी सशस्त्र क्रांतियों से संसद प्रणाली को उखाड़ फेंकना था. लेकिन भारत में लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार थी, राजतंत्र नहीं.
आदिवासियों को बरगलाकर फैलाया गया नक्सलवाद
गृह मंत्री ने आदिवासी क्षेत्रों में नक्सलवाद के फैलने की वजह भी साफ की. उन्होंने कहा कि 1947 से पहले आदिवासी नेताओं जैसे बिरसा मुंडा, रानी दुर्गावती, और तिलका मांझी ही आदर्श थे. लेकिन 1970 के दशक तक, आदिवासी माओ को अपना हीरो मानने लगे. शाह ने इस बदलाव का कारण विकास या अन्याय नहीं, बल्कि वामपंथियों की रणनीति बताया. उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘कठिन भूगोल और सरकारी उपस्थिति की कमी का फायदा उठाकर भोले-भाले आदिवासियों को बरगलाया गया. नक्सलवाद गरीबी के कारण नहीं, बल्कि इसके कारण पूरे इलाके में गरीबी फैली.’
नक्सलवाद का विस्तार और इतिहास
अमित शाह ने इतिहास को याद दिलाते हुए बताया कि नक्सलवाद की शुरुआत नक्सलबाड़ी, पश्चिम बंगाल से हुई. 1971 में वहां 3620 हिंसा की घटनाएं दर्ज की गईं. 1980 के दशक में इसका विस्तार महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और ओडिशा तक हुआ. उन्होंने यह भी याद दिलाया कि इस पूरे दौर में कांग्रेस पार्टी का शासन था.
शाह ने लोकसभा में साफ कहा कि सवाल यह है कि लोग अपनी लड़ाई संवैधानिक तरीकों से लड़ेंगे या हथियार उठाकर निर्दोषों को मारेंगे. उन्होंने जोर देकर कहा, ‘अगर आप धमकाना चाहते हैं कि ये होगा, तो सरकार कहती है हम डरने वाले नहीं हैं. न्याय और कानून सभी के लिए समान हैं.’
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-भारत एक्सप्रेस
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