इस साल की शुरुआत में कोलकाता में एक चुनावी रैली के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गोपाल मुखर्जी को एक बहादुर हिंदू नेता बताया था, जिन्होंने 1946 की हिंसक घटनाओं के दौरान अपने समुदाय की रक्षा की थी, हालांकि कई युवा बंगालियों ने पहले कभी उनका नाम नहीं सुना था. गोपाल मुखर्जी, जिन्हें गोपाल पाठा के नाम से जाना जाता है, एक बार फिर लोगों के बीच चर्चा में हैं
1946 के कलकत्ता दंगों पर आधारित “द बंगाल फाइल्स” की रिलीज़ के बाद गोपाल पाठा की कहानी घरों और राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गई है. फिल्म में गोपाल पाठा के चित्रण ने विवाद खड़ा कर दिया है, खासकर ट्रेलर में उन्हें ‘कसाई’ कहने वाली एक पंक्ति ने.
उनके परिवार, खासकर उनके पोते ने, इस पर कड़ी आपत्ति जताई है और कहा है कि यह उनके जीवन और विरासत दोनों को गलत तरीके से प्रस्तुत करता है. उनका दावा है कि गोपाल मुखर्जी पेशे से कसाई नहीं, बल्कि एक मटन विक्रेता और एक सामुदायिक संगठन में काम करने वाले थे, जिन्होंने अगस्त 1946 में भड़की सांप्रदायिक हिंसा के दौरान हिंदुओं की रक्षा के लिए हथियार उठाए थे..
इतिहास की किताबों से बड़े पर्दे तक
अभी गोपाल मुखर्जी की कहानी रिसर्च पेपर और मौखिक वृत्तांतों तक ही सीमित रही. इतिहासकारों ने बंगाल के मुख्यधारा के राजनीतिक आख्यान में उनके कार्यों को शायद ही कभी स्वीकार किया हो. द बंगाल फाइल्स ने उनकी विरासत का पुनर्मूल्यांकन शुरू कर दिया है. पर ये मामला अब भी विवादास्पद बना हुआ है.
दिलचस्प बात यह है कि फिल्म में गोपाल पाठा का किरदार निभाने वाले अभिनेता सौरव दास भी आलोचनाओं के घेरे में आ गए हैं. कभी तृणमूल कांग्रेस से जुड़े रहे सौरव अब खुद को पार्टी से दूर पाते हैं और सार्वजनिक रूप से दावा करते हैं कि वे अब उनसे जुड़े नहीं हैं.
फिल्म पर पश्चिम बंगाल सरकार के रुख ने बहस को और हवा दे दी है. आलोचकों का तर्क है कि यह पहली बार नहीं है जब किसी राजनीतिक रूप से असुविधाजनक फिल्म को राज्य में प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा हो. इस विवाद ने कई लोगों को यह सवाल उठाने पर मजबूर कर दिया है कि कैसे चुनिंदा स्मृतियाँ और राजनीतिक विचार इतिहास के बारे में जनता की समझ को आकार देते हैं.
इतिहासकारों का सुझाव है कि गोपाल मुखर्जी का फिर से उभरना इस बात का एक उत्कृष्ट उदाहरण है कि कैसे सिनेमा—चाहे विवादास्पद हो या न हो—भूले-बिसरे लोगों को पुनर्जीवित करने में एक शक्तिशाली उपकरण के रूप में काम कर सकता है.
कभी अकादमिक ग्रंथों में दबे नाम वाले गोपाल पाठा को अब कई लोग एक ‘अज्ञात हिंदू नायक’ के रूप में देखते हैं, जिन्होंने, उनके अनुसार, कलकत्ता को सांप्रदायिक अराजकता में और डूबने से बचाने में मदद की.
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