अरुणाचल प्रदेश में सड़क निर्माण के नाम पर करोड़ों की हेराफेरी का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने सरकारी सिस्टम पर सवाल खड़ा कर दिया हैं. ट्रांस-अरुणाचल हाईवे प्रोजेक्ट, जो राज्य की कनेक्टिविटी के लिए गेम-चेंजर माना जा रहा था, अब मुआवजा घोटाले की वजह से सुर्खियों में है. इस मामले में अब प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मोर्चा संभाल लिया है और कई ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी शुरू कर दी है.
क्या है ये पूरा मामला?
ये प्रोजेक्ट 157.70 किलोमीटर लंबे हाईवे की है. इस प्रोजेक्ट को बेहतर मैनेजमेंट के लिए तीन हिस्सों याचुली, जीरो और रागा सेक्टर में बांटा गया था. नियम के मुताबिक, जिन लोगों की जमीन सड़क बनाने के लिए ली गई थी, उन्हें मुआवजा मिलना था. लेकिन यहीं से खेल शुरू हुआ. जांच में पता चला कि जमीन के बदले मिलने वाले मुआवजे के आंकलन और वितरण में जमकर धांधली की गई.
सरकारी अधिकारियों और कुछ निजी लोगों ने मिलकर एक ऐसा सिंडिकेट बनाया, जिसने कागजों पर तो सड़क बनाई, लेकिन असली मकसद अपनी जेबें भरना था.
ED की जांच में जो बातें निकलकर आई हैं, वो हैरान करने वाली हैं. शुरुआत में जीरो के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर ने मुआवजे के लिए करीब 289.40 करोड़ रुपये का एस्टीमेट तैयार किया था. लेकिन जब राज्य स्तर पर इस फाइल की समीक्षा हुई, तो बजट को घटाकर 198.56 करोड़ रुपये कर दिया गया.
जांच एजेंसी का कहना है कि बड़ी मात्रा में पैसा सीधे लोगों के बचत खातों में ट्रांसफर कर दिया गया. हैरानी की बात तो ये है कि ऐसे कई फर्जी लाभार्थियों के नाम पर चेक जारी किया गया, जिनका हकीकत में कोई वजूद ही नहीं था. इस पूरी साजिश की वजह से सरकारी खजाने को सीधे तौर पर करीब 44 करोड़ रुपये का भारी नुकसान उठाना पड़ा है.
ED का एक्शन
अब ED ‘प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट’ (PMLA) के तहत इस मामले की जड़ तक पहुंचने की कोशिश कर रही है. छापेमारी के दौरान कई अहम दस्तावेज और सबूत हाथ लगने की उम्मीद है. जिस तरह से फर्जीवाड़े को अंजाम दिया गया, उससे साफ है कि इसमें निचले स्तर के कर्मचारियों से लेकर ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारियों की मिलीभगत हो सकती है.
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-भारत एक्सप्रेस
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