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PK की एंट्री और अनंत सिंह की बगावत… बिहार विधान परिषद की 8 सीटों पर होने वाले चुनाव से पहले तेज हुई हलचल

बिहार में विधान परिषद की आठ सीटों पर होने वाले चुनाव से पहले सियासी सरगर्मी तेज हो गई है. प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने सभी आठ सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं.

रिपोर्ट- धर्मेंद्र आनंद, बिहटा, पटना


बिहार में विधान परिषद की आठ सीटों पर होने वाले चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज हो गई है. प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज ने इन सभी आठ सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारकर चुनावी मुकाबले में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है. पार्टी की ओर से उम्मीदवारों के मैदान में उतरने के बाद अब अलग-अलग सीटों पर राजनीतिक समीकरण साधने की कोशिशें भी तेज हो गई हैं. खास तौर पर पटना की शिक्षक और स्नातक निर्वाचन सीटों पर सबकी नजर टिकी हुई है.

जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर इन दिनों बिहार की राजनीति में अपनी पार्टी की भूमिका को लेकर लगातार सक्रिय हैं. बांकीपुर सीट पर मिली जीत के बाद पार्टी के कार्यकर्ताओं में उत्साह की चर्चा है. वहीं, विधान परिषद चुनाव में उम्मीदवार उतारने के साथ जन सुराज ने एक बार फिर राज्य की राजनीति में अपनी दावेदारी पेश की है.

पटना स्नातक सीट पर जेडीयू के भीतर खींचतान की चर्चा

आठ सीटों में पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का मुकाबला खास चर्चा में है. यहां जेडीयू के प्रवक्ता नीरज कुमार चुनाव लड़ रहे हैं. हालांकि, उनके सामने सिर्फ चुनावी चुनौती ही नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर से विरोध की खबरें भी सामने आ रही हैं.

मोकामा के जेडीयू विधायक अनंत सिंह खुलकर नीरज कुमार के विरोध में नजर आ रहे हैं. खबरों के मुताबिक, वह अलग-अलग जगहों पर उनके खिलाफ प्रचार भी कर रहे हैं. इस घटनाक्रम ने जेडीयू के भीतर की स्थिति को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं.

बताया जा रहा है कि पार्टी नेतृत्व इस पूरे मामले पर नजर बनाए हुए है. हालांकि, अनंत सिंह के खिलाफ किसी तरह की अनुशासनात्मक कार्रवाई को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है. ऐसे में चुनाव से पहले पार्टी के अंदर चल रही इस खींचतान पर राजनीतिक हलकों की निगाहें बनी हुई हैं.

शिक्षक सीट पर भी जातीय समीकरण अहम

पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में भी मुकाबला दिलचस्प हो गया है. यहां नवल किशोर यादव चुनाव मैदान में हैं, जबकि जन सुराज ने उनके सामने महिला उम्मीदवार दिव्य ज्योति को उतारा है. इस सीट पर उम्मीदवारों के बीच मुकाबले के साथ-साथ सामाजिक समीकरणों की भी चर्चा हो रही है.

विधान परिषद की शिक्षक और स्नातक सीटों का चुनाव आम विधानसभा चुनाव से कुछ अलग होता है. इन सीटों पर संबंधित निर्वाचन क्षेत्र के पात्र शिक्षक और स्नातक मतदाता मतदान करते हैं. ऐसे में उम्मीद की जाती है कि उम्मीदवारों की शैक्षणिक समझ, शिक्षकों की समस्याओं, रोजगार, शिक्षा व्यवस्था और स्नातकों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होगी.

लेकिन बिहार के मौजूदा चुनावी माहौल में जातीय समीकरण भी प्रमुखता से सामने आ रहे हैं. राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों के चयन से लेकर प्रचार के मुद्दों तक में जाति की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं. इससे यह बहस भी तेज हो गई है कि जिन चुनावों में शिक्षक और स्नातक मतदाताओं की भूमिका अहम है, वहां उनकी वास्तविक समस्याओं को कितनी प्राथमिकता मिल रही है.

प्रशांत किशोर ने जाति और राजनीति पर उठाए सवाल

प्रशांत किशोर भी अपने चुनावी दौरों के दौरान जाति और राजनीति के मुद्दे को उठा रहे हैं. बिहटा में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने यादव समाज से जुड़े मुद्दों का जिक्र किया. उनके बयान के मुताबिक, यादवों को चुन-चुनकर एनकाउंटर का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन इसके बावजूद यादव मतदाता लालू प्रसाद यादव को ही वोट देंगे.

उनके इस बयान ने बिहार में जातीय राजनीति और मतदाताओं की राजनीतिक पसंद को लेकर बहस को फिर चर्चा में ला दिया है. हालांकि, यह प्रशांत किशोर का राजनीतिक आकलन और बयान है, जिसे मतदाताओं की वास्तविक पसंद का प्रमाण नहीं माना जा सकता.

वहीं, जहानाबाद में नीट की तैयारी कर रही एक छात्रा की मौत के मामले का जिक्र करते हुए भी प्रशांत किशोर ने सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि जब भूमिहार समाज की एक लड़की की हत्या हुई थी, तब राज्य के डीजीपी और एसएसपी भी भूमिहार समुदाय से थे. इस टिप्पणी के जरिए उन्होंने कानून-व्यवस्था और जाति के आधार पर होने वाली राजनीतिक प्रतिक्रियाओं पर सवाल खड़े किए.

23 तारीख के चुनाव से पहले बढ़ी राजनीतिक सरगर्मी

विधान परिषद की आठ सीटों के लिए 23 तारीख को होने वाले चुनाव से पहले बिहार का राजनीतिक माहौल गर्म है. अलग-अलग दल अपने उम्मीदवारों के पक्ष में प्रचार कर रहे हैं और स्थानीय समीकरणों को ध्यान में रखकर रणनीति बना रहे हैं. जन सुराज की सक्रियता ने भी इस चुनाव को लेकर चर्चा बढ़ाई है.

हालांकि, इस पूरे चुनाव में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रचार के दौरान शिक्षकों और स्नातकों की समस्याओं को पर्याप्त जगह मिल पाएगी? शिक्षा व्यवस्था में सुधार, शिक्षकों की सेवा संबंधी मांगें, रोजगार के अवसर और पढ़े-लिखे युवाओं की चुनौतियां ऐसे मुद्दे हैं, जिनका सीधा संबंध इन मतदाताओं से है.

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