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ट्रंप की धमकियों के बीच भारत ने बताया सच: BRICS की अपनी मुद्रा पर क्या है प्लान? बन गई तगड़ी रणनीति

BRICS Common Currency: विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि ब्रिक्स की कोई साझा मुद्रा (ब्रिक्स करेंसी) शुरू करने का फिलहाल कोई प्रस्ताव नहीं है. हालांकि, ब्रिक्स देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और भुगतान निपटान को बढ़ावा देने पर चर्चा लंबे समय से चल रही है.

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BRICS की अपनी मुद्रा पर क्या है प्लान?

BRICS Common Currency: विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि ब्रिक्स की कोई साझा मुद्रा (ब्रिक्स करेंसी) शुरू करने का फिलहाल कोई प्रस्ताव नहीं है. हालांकि, ब्रिक्स देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और भुगतान निपटान को बढ़ावा देने पर चर्चा लंबे समय से चल रही है और इसे द्विपक्षीय व्यापार की लागत कम करने का एक व्यावहारिक उपाय माना जा रहा है.

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान आयोजित प्रेस ब्रीफिंग में विदेश मंत्रालय में सचिव (आर्थिक संबंध) सुधाकर दलेला ने कहा कि वर्तमान में ब्रिक्स के भीतर किसी साझा मुद्रा को लेकर कोई औपचारिक प्रस्ताव मौजूद नहीं है. उन्होंने कहा कि स्थानीय मुद्रा में व्यापार निपटान का विषय नया नहीं है और इस पर पिछले एक दशक से अधिक समय से विचार-विमर्श हो रहा है.

लेनदेन लागत कम करना है मकसद

दलेला ने कहा कि स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करने से द्विपक्षीय लेनदेन की लागत कम हो सकती है और यह वैश्विक भुगतान एवं निपटान व्यवस्था के पूरक के रूप में काम कर सकता है. उनका कहना था कि इसका उद्देश्य मौजूदा वैश्विक वित्तीय प्रणाली का विकल्प तैयार करना नहीं, बल्कि व्यापार को अधिक सुविधाजनक, किफायती और प्रभावी बनाना है.

विदेश मंत्रालय के अनुसार, ब्रिक्स देशों के बीच चर्चा का मुख्य उद्देश्य साझा मुद्रा बनाना नहीं, बल्कि अंतर-ब्रिक्स व्यापार को बढ़ाना, भुगतान प्रणालियों को बेहतर बनाना और कारोबारियों के लिए लेनदेन लागत कम करना है. दलेला ने कहा कि सदस्य देश द्विपक्षीय और बहुपक्षीय ढांचे के माध्यम से ऐसे तंत्र विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं जो व्यापार और निवेश को आसान बना सकें.

उन्होंने बताया कि स्थानीय मुद्रा में व्यापार और भुगतान व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक गवर्नरों के स्तर पर भी लगातार चर्चा हो रही है और इस दिशा में विभिन्न पहलुओं का अध्ययन किया जा रहा है.

350 से अधिक बैठकें हुई आयोजित

दलेला ने कहा कि इस वर्ष भारत की अध्यक्षता में हुए ब्रिक्स सहयोग के दौरान एमएसएमई सहयोग पोर्टल, ग्लोबल वैल्यू चेन सहयोग, लॉजिस्टिक्स फ्रेमवर्क, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (डीपीआई), विज्ञान एवं अनुसंधान रिपॉजिटरी और स्टार्टअप सहयोग जैसी पहलें प्रमुख उपलब्धियों के रूप में सामने आई हैं.

उन्होंने बताया कि भारत की अध्यक्षता के दौरान 350 से अधिक बैठकें आयोजित की गईं और 30 से अधिक भारतीय शहरों में विभिन्न ब्रिक्स कार्यक्रम हुए. उन्होंने इसे ‘पूरे देश का प्रयास’ बताया.

दलेला ने आगे कहा कि भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स ने चार प्रमुख स्तंभों के तहत लगभग 150 व्यावहारिक परिणाम हासिल किए हैं. इनमें खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य सहयोग, नवाचार, सतत विकास और वैश्विक दक्षिण की प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने से जुड़े कई कदम शामिल हैं.

विदेश मंत्रालय के सचिव ने कहा कि नई दिल्ली घोषणा पत्र में विकास-केंद्रित सहयोग को विशेष महत्व दिया गया है और यह एजेंडा अफ्रीका, एशिया तथा अन्य ग्लोबल साउथ देशों की प्राथमिकताओं के अनुरूप है. भारत ने अपने विकास अनुभवों और विशेषज्ञता को अन्य विकासशील देशों के साथ साझा करने के प्रयासों को भी आगे बढ़ाया है.

हर क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर हुई चर्चा

सुधाकर दलेला ने कहा कि ब्रिक्स के अंतर्गत 22 मंत्रीस्तरीय ट्रैक सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं और लगभग हर क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा हुई है. उन्होंने कहा कि सभी बैठकों में सदस्य देशों की प्रभावी भागीदारी भारत पर उनके भरोसे को दर्शाती है.

इस बीच, ब्रिक्स देशों ने सर्वसम्मति से नई दिल्ली घोषणा पत्र 2026 को अपनाया, जिसमें एकतरफा शुल्क (टैरिफ) और गैर-शुल्क बाधाओं पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई. सदस्य देशों ने कहा कि ऐसी नीतियां वैश्विक व्यापार को विकृत करती हैं और विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के नियमों के अनुरूप नहीं हैं.

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घोषणा पत्र में डब्ल्यूटीओ केंद्रित खुले, पारदर्शी, निष्पक्ष, समावेशी और नियम-आधारित बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था के समर्थन को दोहराया गया. साथ ही इथियोपिया और ईरान की डब्ल्यूटीओ सदस्यता की दावेदारी का समर्थन भी किया गया.

-भारत एक्सप्रेस



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