दिल्ली मेट्रो स्टेशन बंद करने का फैसला कौन करता है?
Delhi Metro Station Closure: दिल्ली में बड़े राजनीतिक प्रदर्शनों और विरोध मार्च के दौरान मेट्रो स्टेशनों के एंट्री और एग्जिट गेट बंद किए जाने की घटनाएं अब आम हो गई हैं. 10 अक्टूबर को हुए सीजेपी प्रदर्शन से पहले 45 मेट्रो स्टेशनों पर आवाजाही सीमित कर दी गई थी. इसके कुछ दिनों बाद सोमवार को विपक्ष के सुप्रीम कोर्ट मार्च के दौरान भी छह मेट्रो स्टेशनों की एंट्री और एग्जिट बंद रखी गई. ऐसे में लोगों के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि आखिर मेट्रो स्टेशन बंद करने का अधिकार किसके पास होता है और उन्हें दोबारा खोलने का निर्णय कैसे लिया जाता है.
प्रदर्शन के बीच यात्रियों को दी गई थी सलाह
सोमवार को हुई कार्रवाई के दौरान अधिकारियों ने बताया कि सुरक्षा एजेंसियां पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए हैं. हालात की समीक्षा शाम चार बजे के बाद की जानी थी, जिसके आधार पर आगे के निर्देश जारी किए जाने थे. यात्रियों से भी कहा गया कि मेट्रो यात्रा शुरू करने से पहले अपने रूट और संबंधित स्टेशनों की स्थिति जरूर जांच लें, ताकि किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े.
मेट्रो स्टेशन बंद होना नई बात नहीं
दिल्ली मेट्रो के इतिहास में यह पहली बार नहीं है जब किसी आंदोलन या सुरक्षा कारणों से स्टेशन बंद किए गए हों. पिछले कई वर्षों में अलग-अलग मौकों पर ऐसी कार्रवाई होती रही है. हालांकि हर बार लोगों के मन में यही सवाल उठता है कि इस तरह का फैसला आखिर कौन लेता है और उसका आधार क्या होता है.
संसद में भी उठ चुका है यह सवाल
मेट्रो स्टेशन बंद करने की प्रक्रिया को लेकर सबसे स्पष्ट जानकारी संसद के रिकॉर्ड में दर्ज है. 27 फरवरी 2013 को लोकसभा में पूछे गए प्रश्न संख्या 640 के जवाब में इस मुद्दे को विस्तार से स्पष्ट किया गया था. सांसद सौगत राय ने सरकार से जानकारी मांगी थी कि दिल्ली में मेट्रो स्टेशन बार-बार क्यों बंद किए जाते हैं और इसके लिए कोई तय मानदंड है या नहीं.
उस समय शहरी विकास मंत्रालय में राज्य मंत्री रहीं दीपा दासमुंशी ने अपने जवाब में बताया था कि दिसंबर 2012 के दौरान कुछ मेट्रो स्टेशनों को दिल्ली पुलिस की सुरक्षा संबंधी सलाह के आधार पर बंद किया गया था. सरकार ने जानकारी दी थी कि 23, 24, 25, 29, 30 और 31 दिसंबर को कई स्टेशनों पर प्रतिबंध लगाए गए थे. इनमें राजीव चौक, पटेल चौक, मंडी हाउस, खान मार्केट और सेंट्रल सेक्रेटेरिएट जैसे अहम स्टेशन शामिल थे.
पुलिस की सलाह सबसे अहम कड़ी
सरकार ने संसद में दिए जवाब में यह भी स्पष्ट किया था कि ऐसे मामलों में स्टेशन बंद करने का निर्णय अक्सर राज्य पुलिस की सुरक्षा सलाह पर लिया जाता है. यानी जब कानून-व्यवस्था या सुरक्षा से जुड़ा कोई संभावित खतरा सामने आता है, तब पुलिस संबंधित एजेंसियों को एहतियाती कदम उठाने की सलाह देती है.
DMRC के बयानों से भी मिलता है यही संकेत
बाद के वर्षों में दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन यानी DMRC की ओर से जारी किए गए बयानों में भी यही प्रक्रिया सामने आई. दिसंबर 2019 में नागरिकता कानून के विरोध प्रदर्शनों के दौरान DMRC ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि दिल्ली पुलिस की सलाह पर पटेल चौक और जनपथ स्टेशनों के एंट्री-एग्जिट गेट बंद किए गए हैं.
उसी अवधि में लगभग 20 मेट्रो स्टेशनों के गेट बंद किए गए थे. वर्ष 2002 में दिल्ली मेट्रो सेवा शुरू होने के बाद यह सबसे बड़े स्तर की बंदियों में से एक मानी गई थी.
जुलाई 2026 में भी अपनाया गया था यही तरीका
जुलाई 2026 में सीजेपी से जुड़े प्रदर्शनों के दौरान DMRC ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर 16 स्टेशनों की सूची साझा की थी. इन स्टेशनों को सुरक्षा कारणों से अगले आदेश तक बंद रखने की जानकारी दी गई थी.
उस समय राजीव चौक, मंडी हाउस और सेंट्रल सेक्रेटेरिएट जैसे व्यस्त स्टेशनों पर केवल इंटरचेंज यानी लाइन बदलने की सुविधा चालू रखी गई थी. मीडिया रिपोर्टों में बताया गया था कि यह कदम भी सुरक्षा एजेंसियों की सलाह के बाद उठाया गया था.
अक्टूबर 2026 का मामला क्या बताता है?
हालिया घटनाक्रम से इस पूरी प्रक्रिया को और बेहतर तरीके से समझा जा सकता है. 8 अक्टूबर 2026 को दिल्ली पुलिस के संयुक्त आयुक्त (ट्रांसपोर्ट रेंज) की ओर से DMRC को एक पत्र भेजा गया था. इस पत्र में 9 अक्टूबर की रात नौ बजे से 57 मेट्रो स्टेशनों के एंट्री और एग्जिट संचालन को बंद करने पर विचार करने का अनुरोध किया गया था.
पुलिस ने स्टेशन बंद करने के साथ-साथ कुछ स्थानों पर ट्रेनों की फ्रीक्वेंसी कम करने का सुझाव भी दिया था. इसके बाद DMRC ने समीक्षा कर संशोधित नोटिस जारी किया. अंतिम आदेश में 45 मेट्रो स्टेशनों के एंट्री-एग्जिट गेट 9 अक्टूबर रात नौ बजे से 10 अक्टूबर शाम छह बजे तक बंद रखने की घोषणा की गई.
DMRC ने यह भी कहा था कि सुरक्षा एजेंसियां परिस्थितियों की लगातार समीक्षा करेंगी और आवश्यकता पड़ने पर नए निर्देश जारी किए जाएंगे. इससे साफ होता है कि सुरक्षा एजेंसियां सुझाव देती हैं, जबकि अंतिम संचालन संबंधी घोषणा DMRC जारी करता है.
कानून में क्या प्रावधान हैं?
मेट्रो रेल (प्रचालन और अनुरक्षण) अधिनियम, 2002 के तहत मेट्रो व्यवस्था के सामान्य संचालन, पर्यवेक्षण और नियंत्रण की जिम्मेदारी महाप्रबंधक के पास होती है. अधिनियम की धारा 6(1) मेट्रो प्रशासन को अपने कार्यों के संचालन के लिए आवश्यक और उचित कदम उठाने का अधिकार देती है.
इसके अलावा धारा 62 मेट्रो परिसर के भीतर किसी भी प्रकार के प्रदर्शन या विरोध गतिविधि पर रोक लगाती है. इस प्रावधान के तहत प्रशासन को ऐसे लोगों को परिसर से बाहर करने का अधिकार भी प्राप्त है. वहीं धारा 97 के अनुसार मेट्रो प्रशासन अपना सुरक्षा स्टाफ भी रख सकता है.
कब पूरी मेट्रो सेवा बंद की जा सकती है?
कानून की धारा 18 एक अलग स्थिति को संबोधित करती है. इसके तहत यदि जनता की सुरक्षा को गंभीर खतरा हो तो मेट्रो सुरक्षा आयुक्त की रिपोर्ट के आधार पर केंद्र सरकार मेट्रो संचालन बंद करने का निर्देश दे सकती है. हालांकि सामान्य तौर पर किसी स्टेशन के एंट्री-एग्जिट गेट बंद किए जाने की कार्रवाई सुरक्षा एजेंसियों की सलाह और DMRC के संचालन संबंधी फैसलों के तहत ही की जाती है.
इस तरह दिल्ली मेट्रो स्टेशनों की बंदी का फैसला केवल एक संस्था नहीं लेती, बल्कि इसमें दिल्ली पुलिस, अन्य सुरक्षा एजेंसियां और DMRC सभी की भूमिका होती है. हालात सामान्य होने और सुरक्षा समीक्षा पूरी होने के बाद ही स्टेशनों को दोबारा खोलने का निर्णय लिया जाता है.
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