एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में नैतिक चरित्र और समावेशी सहभागिता पर केंद्रित राष्ट्रीय एकता के लिए एक शक्तिशाली स्वर गूंजा. “एक वतन, एक क़ौम – हिन्दुस्तान” के नारे पर केंद्रित इस इज्तिमा ने शिक्षा, अल्पसंख्यक मामले और सिविल सोसाइटी के बुद्धिजीवी नेताओं को एक मज़बूत और समरस भारत की बुनियादी स्तंभों पर ग़ौर-व-ख़याल के लिए एकत्र किया.
औपचारिक शिक्षा से आगे: चरित्र को प्राथमिकता
जामिया हमदर्द के रजिस्ट्रार और संगोष्ठी के संचालक कर्नल ताहिर मुस्तफा ने इसके वैचारिक लहजे को तय करते हुए बहस को रूढ़िवादी ढांचों से आगे बढ़ाया. उन्होंने तालीम (औपचारिक शिक्षा) और तरबियत (मूल्याधारित चरित्र निर्माण) के बीच अहम फ़र्क स्पष्ट किया, और इस बात पर ज़ोर दिया कि एकता ही एक मज़बूत क़ौम की असली बुनियाद है. उनका मत था कि “नैतिक शक्ति और नागरिक मूल्य ही एक मज़बूत और समरस राष्ट्र की वास्तविक नींव हैं,” जिसने चरित्र के निर्माण को एक राष्ट्रीय अनिवार्यता के तौर पर रेखांकित किया.
समावेशी राष्ट्र निर्माण के लिए ईमानदार अपील
संगोष्ठी में सामूहिक ज़िम्मेदारी के केंद्रीय विचार के तहत नज़रियों का संगम देखने को मिला. मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के मार्गदर्शक और आरएसएस के वरिष्ठ नेता डॉ. इंद्रेश कुमार, जो एक शांति दूत भी हैं, ने एकता, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक समरसता पर ज़ोर देते हुए एक प्रभावशाली भाषण दिया. उन्होंने मुस्लिम समुदाय से ख़लूस के साथ अपील की कि वे राष्ट्रीय विकास में सक्रिय योगदान दें, और इस बात पर बल दिया कि शांतिपूर्ण भारत के लिए साझा ज़िम्मेदारी अनिवार्य है. समावेशन पर इस ध्यान की गूंज राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान आयोग (NCMEI) के कार्यकारी अध्यक्ष प्रोफेसर (डॉ.) शाहिद अख़्तर ने भी सुनाई, जिन्होंने अल्पसंख्यक संस्थानों को शिक्षा, कौशल विकास और सामाजिक सशक्तिकरण में “समावेशन के महत्वपूर्ण पुल” के तौर पर रेखांकित किया.
सतत विकास के लिए एकता: एक प्रेरक शक्ति
विद्वतापूर्ण दृष्टिकोण नेसंगोष्ठी के केंद्रीय संदेश को और मज़बूती दी. मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी (MANUU), हैदराबाद के प्रो. पी. एफ. रहमान ने तर्क दिया कि वास्तविक राष्ट्रीय प्रगति का समावेशन से गहरा संबंध है. उन्होंने कहा कि “वास्तविक प्रगति तभी संभव है जब समाज का हर वर्ग स्वयं को शामिल, सम्मानित और सशक्त महसूस करे,” और उन्होंने देश के भविष्य की रचना में सामूहिक सहभागिता की अपील की. प्रख्यात कैंसर सर्जन डॉ. माजिद अहमद तालीकोटी ने इस बात को दोहराया कि सामाजिक समरसता और आपसी विश्वास सतत राष्ट्रीय विकास के अपरिहार्य प्रेरक तत्व हैं. एक आध्यात्मिक आयाम जोड़ते हुए सूफी नेता सैयदना ज़की ने अंतर-धार्मिक समझ और करुणा पर ज़ोर दिया, और इसे एक शांतिपूर्ण और प्रगतिशील समाज की बुनियाद बताया.
एक एकजुट कर देने वाला समापन: एक वतन, एक क़ौम
संगोष्ठी का समापन इसके केंद्रीय सिद्धांत की ज़ोरदार, एकजुट और सामूहिक पुष्टि के साथ हुआ. “एक वतन, एक क़ौम – हिन्दुस्तान” का संदेश केवल प्रस्तुत नहीं किया गया बल्कि सामूहिक रूप से पुनः दृढ़ता से घोषित किया गया, जिसे श्रोताओं ने सराहना और करतल ध्वनि से स्वीकार किया. यह एक साझे संकल्प की शक्तिशाली प्रतीक बना. एक ऐसी राष्ट्रीय पहचान गढ़ने के संकल्प की जहां एकता, शांति और समावेशी विकास महज़ आकांक्षात्मक लक्ष्य नहीं बल्कि राष्ट्र के आगे बढ़ने का एकमात्र मार्ग हैं.
-भारत एक्सप्रेस
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