England TB study
England TB study: टीबी को लेकर इंग्लैंड से एक चिंताजनक रिपोर्ट सामने आई है. एक नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि इंग्लैंड में हर सप्ताह कम से कम एक व्यक्ति की मौत इसलिए हो जाती है क्योंकि उसके जीवित रहते टीबी का पता ही नहीं चल पाता. हैरानी की बात यह है कि कई मामलों में बीमारी की पहचान केवल मौत के बाद पोस्टमार्टम के दौरान होती है, जिससे मरीज को इलाज का मौका तक नहीं मिल पाता.यह अध्ययन प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल Thorax में प्रकाशित हुआ है. शोधकर्ताओं के अनुसार, जिन लोगों में मृत्यु के बाद टीबी की पुष्टि हुई, उनमें अधिकांश ब्रिटेन में जन्मे और अधिक उम्र के पुरुष थे. विशेषज्ञों का मानना है कि डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी इन मरीजों में टीबी की संभावना पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे रहे हैं, जिसके कारण बीमारी का समय पर निदान नहीं हो पा रहा.
मरीज से टीबी से जुड़ा सवाल जरुर पूछे
अध्ययन की सह-लेखिका और लिवरपूल यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल्स NHS फाउंडेशन ट्रस्ट की रेजिडेंट डॉक्टर डॉ. एलेनोर मॉर्गन ने कहा कि इंग्लैंड में टीबी के बढ़ते मामलों को देखते हुए हर मरीज का मूल्यांकन करते समय यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि क्या यह टीबी हो सकती है? भले ही वह व्यक्ति सामान्य जोखिम वाले समूह में शामिल न हो.
अधिकतर केसों में मौत के बाद पता चलती है टीबी
शोध में यह भी सामने आया कि मृत्यु के बाद टीबी की पहचान उन लोगों में अधिक हुई जो लंदन के बाहर रहते थे या जिनका शराब और नशीले पदार्थों के सेवन का इतिहास रहा था. इसके अलावा, चार वर्ष से कम उम्र के बच्चों में भी जोखिम अधिक पाया गया. विशेषज्ञों के मुताबिक, छोटे बच्चों की प्रतिरक्षा प्रणाली पूरी तरह विकसित नहीं होती और उनमें बीमारी के लक्षण सामान्य संक्रमण जैसे दिखाई देते हैं, जिससे समय पर पहचान मुश्किल हो जाती है. विशेषज्ञों ने कहा कि मृत्यु के बाद टीबी का पता चलना एक “नेवर इवेंट” माना जाना चाहिए, यानी ऐसी घटना जो किसी भी स्थिति में नहीं होनी चाहिए और जिसकी हर बार गहन जांच की जानी चाहिए.
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टीबी की रोकथाम और इलाज दोनों संभव
इंग्लैंड में टीबी के मामले पिछले एक दशक में सबसे अधिक स्तर पर पहुंच गए हैं. वर्ष 2024 में प्रति एक लाख आबादी पर 9.4 मामले दर्ज किए गए, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO)की “कम संक्रमण वाले देश” की सीमा के बेहद करीब है.हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि घबराने की जरूरत नहीं है. टीबी एक ऐसी बीमारी है जिसकी रोकथाम और इलाज दोनों संभव हैं. आधुनिक एंटीबायोटिक दवाओं और नई उपचार पद्धतियों की मदद से दवा-प्रतिरोधी टीबी का इलाज भी पहले की तुलना में काफी प्रभावी और कम समय में किया जा सकता है. उनका कहना है कि समय पर पहचान और उपचार ही इस बीमारी से होने वाली मौतों को रोकने की सबसे बड़ी कुंजी है.
भारत एक्सप्रेस
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