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शरीर के आर-पार गुजरते हैं ये रहस्यमयी कण! फ्रांसिस हॉल्ज़ेन को भौतिकी का नोबेल, जानिए दक्षिणी ध्रुव की बर्फ ने कैसे बदल दिया खगोल विज्ञान?

दक्षिणी ध्रुव की बर्फ में छिपे ब्रह्मांड के रहस्यमयी कणों को पकड़ने की दिशा में अहम योगदान देने वाले वैज्ञानिक फ्रांसिस हॉल्ज़ेन को भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.

ब्रह्मांड अपने अंदर ऐसे कई राज छिपाए बैठा है, जिन तक पहुंचना वैज्ञानिकों के लिए हमेशा आसान नहीं रहा. इन्हीं रहस्यों में से एक न्यूट्रिनो हैं. ऐसे बेहद सूक्ष्म कण, जो लगातार हमारे आसपास से गुजरते रहते हैं, लेकिन आम तौर पर उनका पता लगाना लगभग नामुमकिन होता है. इन्हीं कणों को समझने और दूर अंतरिक्ष से आने वाले बेहद ऊर्जावान न्यूट्रिनो को पकड़ने की दिशा में अहम काम करने वाले वैज्ञानिक फ्रांसिस हॉल्ज़ेन को भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.

हॉल्ज़ेन का सबसे बड़ा विचार था कि पृथ्वी के दक्षिणी ध्रुव पर जमी विशाल बर्फ की परत को एक विशाल वैज्ञानिक डिटेक्टर की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है. इसी सोच से आगे चलकर IceCube Neutrino Observatory का निर्माण हुआ. यह करीब एक घन किलोमीटर में फैला बर्फ के अंदर बना ऐसा वैज्ञानिक उपकरण है, जिसमें हजारों प्रकाश सेंसर लगाए गए हैं.

आखिर न्यूट्रिनो इतने खास क्यों हैं?

न्यूट्रिनो हर जगह मौजूद हैं. ये लगातार पृथ्वी और यहां तक कि हमारे शरीर के आर-पार निकलते रहते हैं और हमें इसका कोई एहसास तक नहीं होता है. इसकी वजह यह है कि न्यूट्रिनो पदार्थ के साथ बेहद कम प्रतिक्रिया करते हैं. कभी कोई न्यूट्रिनो किसी परमाणु के केंद्रक से टकराता है. इसी दुर्लभ टक्कर से पैदा होने वाली रोशनी को खास सेंसरों की मदद से रिकॉर्ड किया जा सकता है.

वैज्ञानिकों को लंबे समय से पता है कि ब्रह्मांड में कुछ ऐसी प्राकृतिक जगहें हैं, जो बेहद शक्तिशाली कण त्वरक की तरह काम करती हैं. वहां पैदा होने वाले कणों की ऊर्जा पृथ्वी पर बनाई जा सकने वाली ऊर्जा से लाखों गुना ज्यादा हो सकती है. लेकिन इन स्रोतों की असली प्रकृति और उनके भीतर चलने वाली प्रक्रियाओं के बारे में अभी भी कई सवाल हैं.

दक्षिणी ध्रुव की बर्फ बनी वैज्ञानिकों की प्रयोगशाला

फ्रांसिस हॉल्ज़ेन ने वर्ष 1988 में दक्षिणी ध्रुव की बर्फ में न्यूट्रिनो पकड़ने का विचार सामने रखा था. उनका मानना था कि जब कोई न्यूट्रिनो बर्फ में मौजूद परमाणु के केंद्रक से टकराएगा, तो उससे निकलने वाली हल्की चमक को सेंसरों के जरिए दर्ज किया जा सकता है.

दक्षिणी ध्रुव इसके लिए कई मायनों में उपयुक्त जगह थी. वहां की बर्फ बेहद साफ है, बाहरी दखल अपेक्षाकृत कम है और यह इलाका भूगर्भीय रूप से भी स्थिर माना जाता है. धीरे-धीरे दूसरे वैज्ञानिक भी इस विचार से जुड़े और बर्फ के अंदर सेंसर लगाकर शुरुआती परीक्षण शुरू हुए.

लेकिन एक बड़ी चुनौती थी कि इतनी ऊंची ऊर्जा वाले ब्रह्मांडीय न्यूट्रिनो बहुत कम संख्या में पृथ्वी तक पहुंचते हैं. इसलिए वैज्ञानिकों को बहुत बड़े क्षेत्र में डिटेक्टर लगाने की जरूरत थी. इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए IceCube का विशाल ढांचा तैयार किया गया, जो 2011 में पूरा हुआ.

इसके बाद वैज्ञानिकों ने पहली बार बेहद ऊर्जावान न्यूट्रिनो को पकड़ना शुरू किया. कुछ वर्षों के भीतर ऐसे न्यूट्रिनो भी दर्ज किए गए, जिनके बारे में माना गया कि वे हमारे सौर मंडल से बहुत दूर अंतरिक्षीय स्रोतों से आए थे.

नई तरह की खगोल विज्ञान की शुरुआत

इस खोज ने वैज्ञानिकों को ब्रह्मांड को देखने का एक बिल्कुल नया तरीका दिया. आम तौर पर खगोल वैज्ञानिक प्रकाश, रेडियो तरंगों या दूसरे संकेतों के जरिए अंतरिक्ष को समझते हैं. लेकिन न्यूट्रिनो सीधे उन बेहद हिंसक और ऊर्जावान घटनाओं की जानकारी ला सकते हैं, जहां से वे पैदा हुए हैं.

नोबेल समिति के भौतिकी पुरस्कार अध्यक्ष मार्क पियर्स के मुताबिक, हॉल्ज़ेन ने वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम का नेतृत्व किया और ऐसा शानदार उपकरण तैयार करने में मदद की, जिसने खगोल विज्ञान के एक नए रास्ते को खोल दिया.

IceCube लगातार न्यूट्रिनो से जुड़ी घटनाओं को रिकॉर्ड कर रहा है. वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि आने वाले समय में इन आंकड़ों से ब्रह्मांड के सबसे शक्तिशाली और हिंसक हिस्सों के बारे में कई नई जानकारियां मिलेंगी. संभव है कि इसी खोज के दौरान वैज्ञानिकों को ऐसे अंतरिक्षीय घटनाक्रमों के संकेत भी मिल जाएं, जिनके बारे में आज हमारी जानकारी बेहद सीमित है.

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-भारत एक्सप्रेस



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