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भारत की आजादी के 14 साल बाद 36 घंटे में कैसे आजाद हुआ गोवा? आज ही खत्म हुई थी 451 साल की गुलामी

भारत को 1947 में आजादी तो मिल गई थी, लेकिन गोवा तब भी पुर्तगालियों के कब्जे में था. जानिए उन जांबाज नायकों और भारतीय सेना के उस मिशन की कहानी, जिसने कूटनीति फेल होने के बाद सैन्य ताकत से गोवा को भारत का अभिन्न अंग बनाया.

Goa Liberation Day, Operation Vijay

Goa Liberation Day 2025: हम अक्सर 15 अगस्त 1947 को आजादी का जश्न मनाते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि उस दिन भी भारत का एक हिस्सा गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था? जी हां, जिस समय पूरा देश अंग्रेजों का शासन खत्म होने की खुसी में तिरंगा लहरा रहा था, उस वक्त गोवा के लोग पुर्तगालियों के जुल्म सह रहे थे.

भारत को अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद भी गोवा को आजाद होने में पूरे 14 साल और लग गए. आज 19 दिसंबर है, यानी वही ऐतिहासिक दिन जब 1961 में भारतीय सेना ने महज 36 घंटे के भीतर 451 साल पुराने पुर्तगाली साम्राज्य को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था.

आइए जानते हैं उस ‘ऑपरेशन विजय’ और उन नायकों की कहानी, जिन्होंने गोवा की मिट्टी को फिर से भारत का हिस्सा बनाया.

व्यापार के बहाने से बनाया गुलाम

गोवा पर पुर्तगालियों के शासन की कहानी साल 1510 में शुरू हुई थी, जब पुर्तगाली सेनापति अल्फांसो डी अल्बुकर्क ने इस खूबसूरत इलाके पर कब्जा किया. धीरे-धीरे गोवा एशिया में व्यापार का सबसे बड़ा अड्डा बन गया. लेकिन सत्ता मिलने के बाद पुर्तगालियों ने जो किया, वह रूह कंपा देने वाला था. स्थानीय लोगों पर ईसाई धर्म थोपा गया, मंदिरों को तोड़ा गया और वहां की संस्कृति को कुचलने की कोशिश की गई.

लेकिन गोवा के लोगों ने कभी हार नहीं मानी. पुर्तगालियों के खिलाफ विद्रोह की चिंगारी 16वीं सदी से ही जल रही थी. 1583 का ‘कुनकोलिम विद्रोह’ हो या 1787 की ‘पिंटोस की साजिश’, हर बार गोवा के लोगों ने अपनी पहचान बचाने के लिए जान की बाजी लगाई.

राणे परिवार की जांबाजी और लोहिया का जोश

पुर्तगालियों के खिलाफ सबसे लंबी लड़ाई ‘सतारी के राणे परिवार’ ने लड़ी. उन्होंने 1755 से 1895 के बीच एक-दो बार नहीं, बल्कि पूरे 14 बार बगावत की. दीपाजी राणे और दादा राणे जैसे योद्धाओं ने गुरिल्ला युद्ध के जरिए पुर्तगालियों की नाक में दम कर दिया था.

20वीं सदी आते-आते यह आंदोलन और संगठित हो गया. लेकिन साल 1946 में जब डॉ. राम मनोहर लोहिया गोवा पहुंचे, तो उन्होंने आजादी की मशाल को एक नई हवा दी. उन्होंने मारगांव में एक विशाल सभा की, जिसे ‘गोवा मुक्ति का जनक’ माना जाता है. लोहिया की गिरफ्तारी ने पूरे गोवा में सत्याग्रह की लहर दौड़ा दी.

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कूटनीति फेली तो चलीं बंदूकें

1947 में भारत आजाद हुआ तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कोशिश की कि बातचीत से गोवा मिल जाए. लेकिन पुर्तगाल के तानाशाह सालाज़ार अपनी जिद पर अड़े थे. 1955 में जब निहत्थे सत्याग्रहियों पर पुर्तगाली पुलिस ने गोलियां चलाईं और कई भारतीय शहीद हुए, तब देश के हर नागरिक का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया.

आखिरकार, दिसंबर 1961 में नेहरू सरकार ने सैन्य कार्रवाई का फैसला किया. इसे नाम दिया गया ‘ऑपरेशन विजय’. 18 दिसंबर को थल सेना, वायु सेना और नौसेना ने मिलकर हमला बोला. पुर्तगालियों को अंदाजा भी नहीं था कि भारतीय सेना इतनी ताकतवर होगी. मात्र 36 घंटों के भीतर, 19 दिसंबर को पुर्तगाली गवर्नर वासालो ई सिल्वा ने सरेंडर कर दिया. इसी के साथ 451 साल का विदेशी शासन मिट्टी में मिल गया.

कैसा है आज का गोवा?

आजादी के बाद गोवा, दमन और दीव को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया. 1987 में गोवा को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला. आज गोवा न केवल भारत का एक अटूट हिस्सा है, बल्कि पर्यटन और संस्कृति के मामले में दुनिया में मौजूद कई अच्छी जगहों को पीछे छोड़ता है.

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-भारत एक्सप्रेस



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