Bharat Express DD Free Dish
Kanya Sumangla Mission Shakti Digital
Kanya Sumangla Mission Shakti Digital

होमी व्यारावाला : कैमरे की नजर से आजादी देखने वाली पहली भारतीय महिला

होमी व्यारावाला भारत की पहली महिला फोटो जर्नलिस्ट थीं, जिनके कैमरे ने गांधी जी के आंदोलनों से लेकर 15 अगस्त 1947 के ऐतिहासिक क्षणों तक को अमर बनाया. पुरुष-प्रधान मीडिया जगत में उन्होंने अपनी मेहनत, तकनीक और साहस से ऐसी तस्वीरें उतारीं जो आज भी भारत के इतिहास की पहचान हैं. 2011 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया.

homi-vyarawalla-indias-first-woman-photojournalist-biography

जब हम स्वतंत्रता संग्राम और आजादी के शुरुआती वर्षों की तस्वीरें देखते हैं – गांधी जी का डांडी मार्च, भारत छोड़ो आंदोलन की रैलियां, 15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि में लाल किले पर तिरंगा फहराते नेहरू जी – तो इनमें से कई ऐतिहासिक फ्रेम एक ही महिला के कैमरे से निकले थे. उनका नाम था होमी व्यारावाला (1913-2012) – भारत की पहली महिला फोटो जर्नलिस्ट.

संघर्ष भरा शुरुआती सफर

9 दिसंबर 1913 को गुजरात के नवसारी में एक पारसी परिवार में जन्मी होमी का बचपन बॉम्बे (अब मुंबई) में बीता. उनके पिता एक थिएटर कंपनी में काम करते थे, इसलिए घर में कला और अभिव्यक्ति का माहौल था. लेकिन उस दौर में लड़कियों के लिए फोटोग्राफी करियर तो दूर, कैमरा हाथ में लेना भी असामान्य था.

होमी ने बॉम्बे के सेंट जेवियर्स कॉलेज और फिर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से पढ़ाई की. यहीं उनकी मुलाकात मनोहर सिंह व्यारावाला से हुई, जो खुद एक फोटोग्राफर थे. दोनों ने शादी कर ली और मनोहर की मदद से होमी ने फोटोग्राफी सीखी. 1930 के दशक में उन्होंने अपना पहला कैमरा खरीदा – एक Rolleiflex.

1940 का दशक : इतिहास को कैद करने वाली आंखें

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान दिल्ली आकर बसीं होमी ने ब्रिटिश इंफॉर्मेशन सर्विसेज में फोटोग्राफर के तौर पर काम शुरू किया. जल्द ही वे फ्रीलांस हो गईं और ‘द इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया’ जैसी पत्रिकाओं के लिए काम करने लगीं.

उनकी सबसे मशहूर तस्वीरें भारत छोड़ो आंदोलन (1942) की हैं. पुलिस की सख्ती और गिरफ्तारियां होने के बावजूद वे मैदान में मौजूद रहती थीं. लो-एंगल शॉट्स लेकर उन्होंने नेताओं को विशाल और प्रेरक दिखाया, जबकि बैकलाइटिंग का इस्तेमाल करके माहौल में नाटकीयता पैदा की. ये तकनीकी प्रयोग उस समय भारतीय फोटोग्राफी में बिल्कुल नए थे.

15 अगस्त 1947 की आधी रात को जब जवाहरलाल नेहरू ने लाल किले पर तिरंगा फहराया, उस पल को कैमरे में कैद करने वाली एकमात्र महिला फोटोग्राफर होमी व्यारावाला ही थीं. उनकी वह तस्वीर आज भी इतिहास की किताबों में छपी मिलती है.

पितृसत्तात्मक समाज में एक महिला का कैमरा

उस दौर में प्रेस फोटोग्राफरों का क्षेत्र लगभग पूरी तरह पुरुषों का था. होमी को अक्सर “महिलाएं यह काम नहीं कर सकतीं” जैसे ताने सुनने पड़ते थे. साड़ी पहनकर भारी Rolleiflex कैमरा लटकाए, भीड़ में घुसकर फोटो खींचना आसान नहीं था. लेकिन उन्होंने कभी शिकायत नहीं की. उल्टा, वे सादे कपड़ों में, बिना किसी शोर-शराबे के अपना काम करती रहीं.

वे गांधी, नेहरू, जिन्ना, माउंटबेटन, इंदिरा गांधी, जैकलीन कैनेडी तक – सभी बड़े नेताओं की तस्वीरें खींच चुकी थीं. विदेशी पत्रिकाएं जैसे ‘टाइम’ और ‘लाइफ’ भी उनकी तस्वीरें छापती थीं.


ये भी पढ़ें: ‘बिहार के बाद अब बंगाल की बारी’, NDA की बैठक में पीएम मोदी ने दिया जीत का मंत्र


एकांत की जिंदगी और अंतिम वर्ष

1970 में पति की मृत्यु के बाद होमी ने फोटोग्राफी छोड़ दी. वे वडोदरा चली गईं और एकदम साधारण जीवन जिया. उनकी हजारों नेगेटिव्स वर्षों तक एक ट्रंक में बंद रहे. 1990 के दशक में जब फोटो आर्काइव ने उनके काम को फिर से सामने लाया, तब दुनिया को पता चला कि आजादी के जो दृश्य हम देखते आए हैं, उनमें एक महिला की नजर कितनी अहम थी.

2011 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया – यह सम्मान लेने वाली वे पहली फोटो जर्नलिस्ट थीं. 15 जनवरी 2012 को 98 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ. जब समाज कहता था “लड़कियां घर में रहें”, तब उन्होंने चुपचाप अपना रास्ता बनाया और इतिहास की गवाह बन गईं.

-भारत एक्सप्रेस



इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read


Kanya Sumangla Mission Shakti Digital

Latest