साल 2025 में दूसरी बार अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया के कई देशों पर भारी टैरिफ लगा दिया था. उन्होंने भारत पर भी 27 अगस्त 2025 को 50 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया था. ट्रंप ने इनमें 25 प्रतिशत रेसिप्रोकल टैरिफ (जैसे को तैसा) और 25 प्रतिशत रूस से तेल खरीदने को लेकर टैरिफ लगाया था. अब 5 महीनों के बाद ट्रंप ने इस टैरिफ को घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया.
डोनाल्ड ट्रंप ने इसकी जानकारी अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म सोशल ट्रूथ पर दी. जिसमें उन्होंने कहा कि वो पीएम मोदी से दोस्ती और सम्मान के चलते इस ट्रेड डील पर राजी हो गए हैं. उन्होंने बताया कि अमेरिका इस टैरिफ को घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया है. वहीं भारत भी अमेरिकी सामानों के पर जीरो टैरिफ लगायेगा. वहीं अमेरिका से 500 बिलियन डॉलर का सामान भी भारत खरीदेगा, ऐसी जानकारी ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में दी.
भारत-अमेरिका ट्रेड डील की पीएम मोदी ने सराहना की है. उन्होंने एक्स पर कहा कि आलोचनाओं के बावजूद सरकार ने धैर्य रखा, जिसका परिणाम इस ऐतिहासिक डील के रूप में सामने आया.
राहुल गांधी ने बताया गुब्बारा
वहीं भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने करारा हमला बोला है. उन्होंने कहा कि 4 महीने से रुकी ट्रेड डील पर पीएम मोदी ने कल साइन कर दिया है. इस डील में भारत के किसानों की मेहनत को बेच दिया गया है. मोदी जी पर अमेरिका का भयंकर प्रेशर है. हजारों करोड़ रुपये खर्च कर बने इमेज का गुब्बारा फूटने वाला है.
राहुल गांधी के इस बयान में किसानों की उन चिंताओं का जिक्र किया गया है, जिसको लेकर भारत हमेशा से अडिग रहा है. आखिर वो कौन-कौन से अमेरिकी प्रोडक्ट हैं, जिनपर सबसे ज्यादा विवाद है और अगर वो भारत में आएं तो क्या नुकसान उठाना पड़ सकता है? आज के एक्सप्लेनर में हम इसी पर बात करेंगे.
किसानों को क्या है डर?
भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंधों में कई अमेरिकी उत्पादों को लेकर विवाद रहा है. जिसमें कृषि और डेयरी बेहद महत्वपूर्ण और नाजुक क्षेत्र हैं. भारत अमेरिकी कृषि और डेयरी उत्पादों पर या तो भारी टैरिफ लगाये हुए है या इन्हें प्रतिबंधित किया गया है, ताकि भारत के किसानों और उपभोक्ताओं की रक्षा हो सके.
डेयरी उत्पाद (Dairy Products)
भारत भले ही दुनिया में सबसे ज्यादा दूध उत्पादन करने वाला देश है, लेकिन प्रति पशु दूध उत्पादकता के मामले में भारत काफी नीचे है. अमेरिका में डेयरी प्रोडक्ट्शन क्षेत्र काफी समृद्ध है. इसका कारण वहां के गायों का भोजन है. अमेरिका में गायों को पशु आधारित ब्लड मील या फैट खिलाया जाता है. जिससे वहां की गायें ज्यादा दूध देती हैं. जो भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ है. इसका भारत के लोग और किसान हमेशा से विरोध करते आए हैं. भारत इस समय इनपर 30 से 60 प्रतिशत टैरिफ लगाता है, जबकि अमेरिका इसे 5-10 प्रतिशत करने की मांग कर रहा है.
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अमेरिकी डेयरी प्रोडक्ट की एंट्री पर क्या नुकसान?
अगर इस ट्रेड डील में अमेरिकी डेयरी प्रोडक्ट को भारत में एंट्री मिलती है तो ग्राहकों को सस्ते दूध उपलब्ध होंगे, लेकिन इसकी कीमत बहुत बड़ी होगी.
भारत में 8 करोड़ से ज्यादा किसान डेयरी पर निर्भर हैं. इनमें से अधिकतर छोटी पूंजी वाले किसान हैं, जिनकी रोजी-रोटी इनपर टिकी हुई है. वहीं अमेरिका में डेयरी किसानों को सब्सिडी दी जाती है, जिससे उनके प्रोडक्ट काफी सस्ते होते हैं. अगर अमेरिकी डेयरी प्रोडक्ट भारत के बाजारों में आते हैं तो भारत के करोड़ों डेयरी किसान आर्थिक संकट से गुजरने लगेंगे. सस्ते आयात से किसानों की आय घट जाएगी. इससे सहकारी डेयरी सिस्टम तबाह हो जाएगा. डेयरी उत्पादों की कीमतें गिरने से लाखों परिवारों को इसका नुकसान उठाना पड़ेगा.
धार्मिक विरोध से डरती हैं सरकारें
अमेरिका में गायों को मीट खिलाया जाता है. मीट खाने वाली गायों के दूध को भारत के बाजारों में बेचने पर भारत की बहुसंख्यक आबादी के गुस्से का शिकार होना पड़ेगा. हिंदू, सिख और जैन धर्मों के मानने वालों का विरोध सरकार पर भारी पड़ सकता है. यहां तक की बॉयकॉट जैसी नौबत भी आ सकती है. इसका ना सिर्फ भारत को आर्थिक तौर पर नुकसान उठाना पड़ेगा, बल्कि चुनावी नुकसान से सरकार सहम सकती है.
जेनेटकली मॉडिफाइड (GM) फसलें (Genetically Modified Crops)
अमेरिका और भारत के बीच ट्रेड डील में GM फसलों को लेकर भी काफी तनाव रहा है. भारत में GM फूड क्रॉप्स पर प्रतिबंध है और इनके आयात पर 30 से 60 प्रतिशत का टैरिफ लगाया गया है. जिन्हें अमेरिका कम करने की मांग करता रहा है. भारत में GM फूड के आयात पर सख्त नियम हैं. जो भी फूड भारत में आयात होता है उसे पहले GM-फ्री सर्टिफिकेट दिखाना होता है. जिसका अमेरिका हमेशा से विरोध करता आया है. अमेरिका मक्का, सोयाबीन, सेब, कपास आदि GM फसलों को भारत में बेचना चाहता है.
अगर प्रवेश हुआ तो क्या होगा?
अमेरिकी GM फसलों की उत्पादन क्षमता काफी ज्यादा होती है. अमेरिकी किसानों को वहां की सरकार भारी सब्सिडी देती है, जिससे ये फसलें काफी सस्ते दामों पर बाजारों में उपलब्ध होती हैं. अगर भारत में ये फसलें आती हैं तो इससे भारतीय किसानों की फसलों की मांग काफी घट जाएगी. जिससे किसानों की आय कम हो जाएगा. वहीं भारत की पारंपरिक फसलें खत्म हो जाएंगी. जिसका खामियाजा अंत में भारत को ही उठाना पड़ेगा.
1960 के दशक में भारत में अमेरिका से अनाज इंपोर्ट होता था. देसी फसलों के विनाश से एक बार फिर भारत में वहीं स्थिति पैदा हो जाएगी.
GM फसलों से भारत की पारंपरिक फसलों के व्यवहार में बदलाव आ सकता है. इन फसलों में परागण की ताकत नहीं होती है. यानी फसल काटने के बाद उस फसल को बीज के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. हर बार बाजार से किसानों को नया बीज खरीदना पड़ता है. अगर भारत में GM फसलों की बिक्री होने लगेगी तो उससे भारत की फसलों में दलाव, मिट्टी, पानी और परागणकर्ता तत्वों को नुकसान उठाना पड़ जाएगा. वहीं GM फसलों से स्वास्थ्य पर भी खराब प्रभाव पड़ता है.
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पोल्ट्री और मीट
भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील में मीट और पोल्ट्री प्रोडक्ट को लेकर भी टेंशन रहा है. भारत में जहां मांस उत्पाद में हार्मोनल चेंजेस को बैन किया गया है, वहीं अमेरिका में इसका धड़ल्ले से इस्तेमाल होता है. अमेरिका में चिकन, डक, टर्की और पोर्क में एंटीबायोटिक्स, हार्मोन्स और विकास को बढ़ाने वाले चीजों का इस्तेमाल होता है. जो स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक होता है. भारत में अमेरिका के मीट और पोल्ट्री प्रोडक्ट पर हमेशा से उच्च टैरिफ लगाया गया है. जिसपर अमेरिका हमेशा से विरोध जताता रहा है.
अगर प्रवेश हुआ तो क्या होगा?
अमेरिका में मांस उत्पादन कम खर्च में होता है, जिसकी वजह से वहां के उत्पाद काफी सस्ते होते हैं. वहीं भारत में मांस का उत्पादन नेचुरल तरीके से करना पड़ता है, जिससे लागत बढ़ जाती है. अगर अमेरिकी प्रोडक्ट भारत के बाजार में आते हैं तो इसका भारत के पोल्ट्री उद्योग को काफी नुकसान पहुंचाएगा. जो उद्योग लाखों लोगों को रोजगार देता है वो एक झटके में बेरोजगारी की वजह बन जाएगा. इससे ना सिर्फ भारत में स्वास्थ्य संकट बढ़ेगा, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था को भी बड़ा नुकसान पहुंचाएगा.
-भारत एक्सप्रेस
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