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इंदिरा गांधी का 44 साल पुराना वो एक फैसला, जो लागू होते ही मचा देता है देश में बवाल… आखिर क्यों खौफ में हैं लोग?

NSA Law Indira Gandhi: 1980 में इंदिरा गांधी सरकार द्वारा लाया गया राष्ट्रीय सुरक्षा कानून आज भी विवादों के केंद्र में है. दिल्ली में जंतर-मंतर पर जारी छात्र प्रदर्शनों के बीच दिल्ली पुलिस को NSA के तहत हिरासत का अधिकार मिलने से राजनीति गरमा गई है. जानिए आखिर क्या है यह कानून और क्यों इसे नागरिक स्वतंत्रता के लिए मुसीबत माना जाता है.

indira gandhi

NSA Law Indira Gandhi: जब भी देश में सत्ता की हनक और नागरिक अधिकारों के बीच टकराव होता है, तो एक ऐसा कानून जरूर निकलकर सामने आता है जो बिना किसी अपराध के भी इंसान को सलाखों के पीछे धकेल सकता है. यह कानून है, राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी NSA. दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलनों और बढ़ते विरोध प्रदर्शनों के बीच दिल्ली पुलिस को एक बार फिर इस कानून के तहत किसी को भी बिना मुकदमे हिरासत में लेने का अधिकार मिल गया है.

दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन के बीच दिल्ली पुलिस को एक बार फिर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत किसी को भी बिना मुकदमे हिरासत में लेने का अधिकार मिल गया है. उपराज्यपाल (LG) के आदेश के बाद 18 अक्टूबर तक दिल्ली पुलिस आयुक्त के पास यह ताकत रहेगी. वैसे तो प्रशासन इसे हर तीन महीने में होने वाली एक ‘रूटीन प्रक्रिया’ बता रहा है, लेकिन जब-जब इस कानून का इस्तेमाल होता है, तब-तब लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों पर सवाल खड़े होने लगते हैं.

आखिर यह NSA कानून क्या है? क्यों इसे देश के सबसे खौफनाक कानूनों में गिना जाता है और इसका संबंध पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से कैसे जुड़ा है? आइए समझते हैं.

1980 में इंदिरा गांधी लाई थीं यह सख्त कानून (National Security Act 1980)

आजादी के बाद देश में सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर कई सख्त कानून बने. 1975 में आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी सरकार ‘मीसा’ (MISA – Maintenance of Internal Security Act) लेकर आई थी, जिसका इस्तेमाल कर हजारों राजनीतिक विरोधियों, पत्रकारों और छात्रों को जेल में डाल दिया गया था. 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार आई, तो उसने इस विवादित ‘मीसा’ को पूरी तरह खत्म कर दिया.

लेकिन 1980 में जब इंदिरा गांधी दोबारा सत्ता में आईं, तो पंजाब और पूर्वोत्तर में उग्रवाद चरम पर था. उग्रवाद से निपटने के नाम पर 23 सितंबर 1980 को इंदिरा सरकार ‘नेशनल सिक्योरिटी एक्ट’ यानी NSA लेकर आई. कहने को तो यह देश की सुरक्षा के लिए था, लेकिन यह कानून वास्तव में ‘मीसा’ का ही नया रूप बनकर उभरा, जो आज भी आम नागरिकों और विरोध की आवाजों के लिए मुसीबत बना हुआ है.

सामान्य गिरफ्तारी और NSA में क्या है अंतर? (Delhi Police NSA Powers)

NSA एक प्रीवेंटिव डिटेंशन (Preventive Detention) कानून है. यानी इसमें पुलिस को किसी व्यक्ति के अपराध करने का इंतजार नहीं करना पड़ता, बल्कि केवल ‘आशंका’ या ‘संदेह’ के आधार पर ही उसे उठाकर जेल में डाला जा सकता है.

  • सामान्य गिरफ्तारी: पुलिस को 24 घंटे के अंदर आरोपी को जज/मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होता है और आरोपी को अपना वकील रखने का पूरा अधिकार मिलता है.
  • NSA के तहत कार्रवाई: न तो 24 घंटे में कोर्ट में पेश करने की मजबूरी है और न ही तुरंत हिरासत की वजह बताना जरूरी है. प्रशासन 5 से 15 दिनों तक बिना वजह बताए भी व्यक्ति को बंद रख सकता है.

बिना मुकदमे 12 महीने तक जेल में रखने की छूट

NSA की धारा 3 सबसे ज्यादा खतरनाक और विवादित मानी जाती है. अगर सरकार या पुलिस को लगता है कि कोई व्यक्ति-

  • भारत की सुरक्षा या रक्षा के लिए खतरा है,
  • सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) बिगाड़ सकता है, या
  • जरूरी सेवाओं की आपूर्ति बाधित कर सकता है…

तो उस व्यक्ति को बिना किसी अदालती ट्रायल या अपराध साबित हुए, सीधे 12 महीने (1 साल) के लिए जेल में रखा जा सकता है.

अंग्रेजों के दौर से चली आ रही है यह मानसिकता (Jantar Mantar Student Protest)

बिना सबूत और बिना मुकदमे के लोगों को जेल में ठूंसने की यह व्यवस्था अंग्रेजों के जमाने की याद दिलाती है. ब्रिटिश हुकूमत ने भारत के स्वतंत्रता सेनानियों को कुचलने के लिए बंगाल रेगुलेशन-3 (1818) और रॉलेट एक्ट (1919) जैसे काले कानून बनाए थे.

आजादी के बाद उम्मीद थी कि ये नीतियां खत्म होंगी, लेकिन नेहरू सरकार के ‘प्रिवेंटिव डिटेंशन एक्ट (1950)’ से लेकर इंदिरा गांधी के ‘मीसा’ और ‘NSA (1980)’ तक- कानूनों के नाम बदलते रहे, लेकिन व्यवस्था वही पुरानी और दमनकारी ही रही.

आज क्यों मुसीबत बना हुआ है (NSA? Delhi LG Order NSA)

मानवाधिकार संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि NSA जैसे सख्त कानूनों का इस्तेमाल अक्सर सरकारें अपनी नाकामियों को छिपाने, शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को दबाने और विपक्षी आवाजों को कुचलने के लिए करती हैं.

जब भी देश में कोई छात्र आंदोलन, किसान प्रदर्शन या नीतिगत विरोध होता है, तो पुलिस प्रशासन के पास NSA के रूप में एक ऐसा हथियार होता है, जिससे किसी भी नागरिक की स्वतंत्रता को पल भर में छीना जा सकता है. यही वजह है कि इंदिरा गांधी के दौर का यह कानून आज 44 साल बाद भी भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बड़ी मुसीबत और बहस का विषय बना हुआ है.

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-भारत एक्सप्रेस



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