Bharat Express DD Free Dish
Pension Mission Shakti Digital
Pension Mission Shakti Digital

जमाअत-ए-इस्लामी हिन्द ने रामनवमी पर हिंसा की खबरों पर जताई चिंता, ‘मीडिया वन’ पर SC के फैसले का किया स्वागत

जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने कहा कि अडानी प्रकरण ने हमारे नियामक निकायों और हमारे लेखा परीक्षकों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया है।

jamat e islami hind

जमाअत-ए-इस्लामी हिन्द के वाइस प्रेसिडेंट इंजीनियर सलीम

जमाअत-ए-इस्लामी हिन्द ने रामनवमी के दौरान हुई हिंसा पर चिंता व्यक्त की और इसकी निंदा की. जमाअत-ए-इस्लामी हिंद की तरफ से गुरुवार को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि यह गंभीर चिंता का विषय है कि भारत के विभिन्न शहरों में हुई हिंसा में समान और परिचित पैटर्न को अपनाया गया. धार्मिक जुलूस की आड़ में की जाने वाली कोई भी हिंसा किसी भी धर्म के लिए बेहद परेशान करने वाली होती है.

जमाअत की तरफ से कहा गया कि धार्मिक त्योहार और जुलूस सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे के लिए होते हैं। अगर इसका इस्तेमाल हिंसा करने या देश की शांति भंग करने के लिए किया जाता है तो यह बेहद निंदनीय है और इसे रोका जाना चाहिए। यह धार्मिक नेताओं के लिए भी विचार करने वाली बात है। उन्हें इस प्रवृत्ति के खिलाफ खुलकर सामने आना चाहिए और अपने अनुयायियों से धार्मिक गतिविधियों को असामाजिक तत्वों द्वारा अपहरण किए जाने से रोकने का आग्रह करना चाहिए। जमाअत ने आशंका जताई कि हाल ही में हुई रामनवमी की हिंसा अनायास नहीं बल्कि पूर्व नियोजित थी। संगठन ने कहा कि ऐसे में यह हमारे खुफ़िया विभाग की घोर विफलता है, जो चिंता का विषय भी है। जमाअत-ए-इस्लामी हिन्द ने प्रशासन और पुलिस से डीजे बजाने की अनुमति नहीं देने का आग्रह भी किया।

देर से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है

जमाअत-ए-इस्लामी हिन्द ने 2008 के जयपुर बम विस्फोट मामले में राजस्थान उच्च न्यायालय के फैसले का स्वागत किया. राजस्थान उच्च न्यायालय की जयपुर खंडपीठ के न्यायमूर्ति पंकज भंडारी और न्यायमूर्ति समीर जैन के फैसले ने मामले के चारों आरोपियों को मौत की सजा सुनाने वाले निचली अदालत के फैसले को पलट दिया है। संगठन ने कहा कि यह निर्णय कुछ परेशान करने वाले सवाल उठाता है। जैसा कि अभियुक्तों को निर्दोष घोषित किया गया है, इसका अर्थ है कि अपराध के असली अपराधी अभी भी आज़ाद हैं। जमाअत ने कहा कि उम्मीद है सरकार विस्फोटों की योजना बनाने और उन्हें अंजाम देने वाले अपराधियों की जांच और पता लगाने के लिए एक नई टीम का गठन करेगी। उसे ऐसा करना ही चाहिए क्योंकि विस्फोटों में मारे गए लोगों के परिजनों को अभी तक न्याय नहीं मिला है।

जमाअत की तरफ से कहा गया कि संगठन कोर्ट से सहमत है कि झूठे आरोप लगाने वाले दोषी पुलिस अधिकारियों की पहचान की जानी चाहिए और उन्हें दंडित किया जाना चाहिए। जमाअत-ए-इस्लामी हिन्द ने मांग करते हुए कहा कि बरी किए गए पांचों को मुआवजा दिया जाए, क्योंकि उन्होंने झूठे मुकदमों में जेल में अपने कीमती जीवन के 15 साल खो दिए। इसके अलावा, उनके परिवारों को “आतंकवादियों” के परिजनों के रूप में लेबल किए जाने के अपमान के अतिरिक्त उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। यह हमारे समाज की समस्या है कि बिना आरोप साबित हुए ही आरोपी को दोषी मान लिया जाता है।

“मीडिया वन” पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

जमाअत-ए-इस्लामी हिन्द ने मलयालम समाचार चैनल मीडिया वन को प्रसारण लाइसेंस का नवीनीकरण करने से इनकार करने के केंद्र के आदेश को खारिज करने के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का स्वागत किया। जमाअत ने कहा कि केरल स्थित टीवी चैनल बेजुबानों की आवाज बनने और लगातार दबे-कुचले लोगों के पक्ष में मुद्दों को उठाने के लिए लोकप्रिय है। इसे गृह मंत्रालय द्वारा सुरक्षा मंजूरी से वंचित कर दिया गया था। जमाअत शीर्ष अदालत की टिप्पणियों से सहमत है कि सरकार नेशनल सिक्योरिटी को नागरिकों को संविधान में दिए गए अधिकारों से रोकने के लिए उपकरण के तौर पर इस्तेमाल कर रही है। यह ‘क़ानून सर्वोपरि है ‘ के खिलाफ है।

चुनावी बॉन्ड

वहीं जमाअत-ए-इस्लामी हिन्द ने एडीआर की रिपोर्ट पर चिंता जताते हुए कहा कि 2021-22 में सात राष्ट्रीय दलों की कुल आय का 66% से अधिक अज्ञात स्रोतों जैसे चुनावी बॉन्ड से आया, जो उनकी आय का 83% हिस्सा था। एक आरटीआई के जवाब के मुताबिक, सरकार ने 2022 में 1 करोड़ रुपये के 10,000 इलेक्टोरल बांड छापे। एसबीआई से उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, हिमाचल प्रदेश और गुजरात में विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों को इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए 545 करोड़ रुपये मिले।

जमाअत ने कहा कि जब से इलेक्टोरल बॉन्ड योजना शुरू की गई है, तब से राजनीतिक दलों द्वारा एकत्र की गई कुल राशि 10,791 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। यह राशि 2018 से 22 चरणों में विभिन्न गुमनाम दानदाताओं से एकत्र की गई है। चुनावी बांड गुमनाम होते हैं; हालांकि, चूंकि वे सरकारी स्वामित्व वाले बैंक (एसबीआई) द्वारा बेचे जाते हैं, इसलिए सरकार के लिए यह जानना आसान होता है कि विपक्ष को कौन फंडिंग कर रहा है। वित्त अधिनियम 2017 में संशोधन करके सरकार ने राजनीतिक दलों को चुनावी बांड के माध्यम से प्राप्त चंदे का खुलासा करने से छूट दी है। यह सुनिश्चित करता है कि मतदाता यह नहीं जान पाएंगे कि किस व्यक्ति, कंपनी या संगठन ने किस पार्टी को और किस हद तक फंड दिया है। चुनावी राजनीति में पैसे का यह असमानुपातिक हिस्सा और वह भी अपारदर्शी तरीके से हमारे लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। चुनाव आयोग चुनाव चलाने के बढ़ते खर्चों को नियमित करने में कोई भूमिका नहीं निभा रहा है। जमाअत ने मांग की और कहा कि राजनीतिक दलों को एक साथ आना चाहिए और पूरी प्रक्रिया को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाकर चुनावों में धन बल के बढ़ते दबदबे को रोकने के लिए कानून लाना चाहिए।

अडानी पर बहस

जमाअत-ए-इस्लामी हिन्द ने अडानी-हिंडनबर्ग रिपोर्ट पर चर्चा न होने पर चिंता जताई। जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने कहा कि अडानी प्रकरण ने हमारे नियामक निकायों और हमारे लेखा परीक्षकों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया है। बताया गया है कि एलआईसी ऑफ इंडिया का अडानी ग्रुप ऑफ कंपनीज में भी एक्सपोजर था। इतने बड़े घटनाक्रम के साथ, यह समझना मुश्किल है कि सरकार इस मुद्दे पर संसद में चर्चा क्यों नहीं चाहती है और अडानी मामले की जांच के लिए जेपीसी गठित करने की विपक्ष की मांग को मानने से इनकार क्यों कर रही है.

-भारत एक्सप्रेस



इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read


Pension Mission Shakti Digital