झारखंड में पुलिस महकमे के सबसे बड़े पद यानी डीजीपी (DGP) की कुर्सी को लेकर छिड़ी कानूनी जंग अब बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गई है. सुप्रीम कोर्ट में मामला इस बात पर अटका है कि क्या राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट और यूपीएससी (UPSC) के नियमों को दरकिनार कर अपनी मर्जी से डीजीपी चुन सकती हैं? अदालत ने झारखंड सरकार से उसकी ‘डीजीपी नियुक्ति नियमावली 2025’ की कानूनी वैधता पर सीधा जवाब मांगा है. अब सभी की निगाहें अक्टूबर के दूसरे हफ्ते में होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं.
अनुराग गुप्ता से शुरू हुआ पूरा फसाद
इस पूरे सियासी और प्रशासनिक ड्रामे की शुरुआत साल 2024 में हुई. पहले जुलाई में अनुराग गुप्ता को प्रभारी डीजीपी बनाया गया, फिर चुनाव आयोग ने उन्हें हटाया, लेकिन चुनाव बीतते ही नवंबर में वे दोबारा कुर्सी पर आ बैठे. इसके बाद राज्य सरकार ने आनन-फानन में 2025 की अपनी नई नियमावली बनाई और गुप्ता को दो साल का फिक्स कार्यकाल दे दिया.
विवाद तब गहराया जब केंद्र ने कहा कि अनुराग गुप्ता तो केंद्रीय सेवा नियमों के तहत रिटायरमेंट की उम्र पार कर चुके हैं. मामला तूल पकड़ा और हाई कोर्ट से होता हुआ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. विवाद बढ़ते देख अनुराग गुप्ता ने नवंबर 2025 में वीआरएस (VRS) ले लिया, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई.
रिटायरमेंट से ठीक एक दिन पहले बनीं DGP
अनुराग गुप्ता के हटते ही सरकार ने 1994 बैच की आईपीएस अधिकारी तदाशा मिश्रा को पहले प्रभारी और फिर पक्का डीजीपी बना दिया. मगर पेंच यह फंसा कि तदाशा मिश्रा को उनकी रिटायरमेंट से महज एक दिन पहले डीजीपी की कमान सौंपी गई थी.
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक ‘प्रकाश सिंह फैसले’ के मुताबिक, डीजीपी की नियुक्ति यूपीएससी द्वारा भेजे गए तीन अफसरों के पैनल में से ही होनी चाहिए, ताकि अफसर को कम से कम दो साल का कार्यकाल मिले. एक दिन की नौकरी बाकी रहते दो साल का कार्यकाल देने की इस तरकीब पर एमिकस क्यूरी और सुप्रीम कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई.
अदालत में केंद्र-राज्य आमने-सामने
झारखंड सरकार की दलील है कि उसने अपनी नियमावली के तहत वरिष्ठता और रिकॉर्ड को देखकर पारदर्शी तरीके से यह फैसला लिया है, क्योंकि यूपीएससी से समय पर पैनल नहीं मिल रहा था. दूसरी तरफ, केंद्र सरकार के सॉलिसिटर जनरल ने अदालत में साफ कहा कि राज्यों को सुप्रीम कोर्ट के तय दिशा-निर्देशों को तोड़कर अपनी अलग राह पकड़ने की छूट नहीं दी जा सकती.
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राज्य सरकार का अपना कानून सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस से ऊपर हो सकता है? क्या पुलिस कप्तान की कुर्सी पर पारदर्शिता बरकरार रहेगी? सुप्रीम कोर्ट का आने वाला फैसला देश भर के पुलिस प्रशासन की दिशा तय करने वाला साबित होगा.
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-भारत एक्सप्रेस
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