गुजरात की कल्पसर परियोजना
Kalpasar Project Gujarat: समुद्र में जाकर व्यर्थ बह जाने वाले नदियों के मीठे पानी को रोकना व्यावहारिक रूप से बहुत कठिन माना जाता है. लेकिन गुजरात सरकार एक ऐसी महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम कर रही है, जो ठीक यही करने जा रही है. यह परियोजना न केवल सूखाग्रस्त क्षेत्रों को पानी उपलब्ध कराएगी, बल्कि परिवहन, नवीकरणीय ऊर्जा, उद्योग और पर्यटन जैसे कई क्षेत्रों में आर्थिक लाभ भी देगी.
क्या है कल्पसर परियोजना?
कल्पसर परियोजना (Kalpasar Project), जिसे गल्फ ऑफ खंभात डेवलपमेंट प्रोजेक्ट भी कहा जाता है, गुजरात सरकार की एक बहुउद्देशीय बुनियादी ढांचा परियोजना है. इसके तहत खंभात की खाड़ी (Gulf of Khambhat) में लगभग 60 से 64 किलोमीटर लंबा बांध या डाइक बनाकर एक विशाल तटीय मीठे पानी का जलाशय तैयार किया जाएगा.
यह दुनिया के सबसे बड़े तटीय मीठे पानी के जलाशयों में से एक होगा. जलाशय का क्षेत्रफल लगभग 1,600 से 2,000 वर्ग किलोमीटर तक फैला होगा और इसकी भंडारण क्षमता लगभग 7,800 मिलियन क्यूबिक मीटर (MCM) मीठे पानी की बताई जाती है (कुछ रिपोर्टों में सकल क्षमता इससे अधिक भी बताई गई है).
इसमें साबरमती, माही, धाधर और सौराष्ट्र की तटीय नदियों के साथ-साथ अन्य नदियों का अपवाह और व्यर्थ बहने वाला मीठा पानी संग्रहित किया जाएगा. पहले के प्रस्तावों में ज्वारीय बिजली का घटक भी शामिल था, लेकिन बाद में इसे हटा दिया गया. अब मुख्य फोकस मीठे पानी के भंडारण, सिंचाई, पेयजल, औद्योगिक उपयोग, परिवहन और नवीकरणीय ऊर्जा पर है.
मुख्य विशेषताएं
डाइक/बांध
लगभग 60.13 किलोमीटर लंबा. इसमें खाड़ी के समुद्री हिस्से में करीब 26.7 किलोमीटर का हिस्सा शामिल है, जबकि शेष भाग भावनगर और भरूच पक्षों पर है.
परिवहन गलियारा
डाइक पर लगभग 130-150 मीटर चौड़ा कॉरिडोर बनाया जाएगा, जिसमें 16-लेन का रोडवे और रेलवे ट्रैक (यात्री व माल दोनों के लिए) होंगे. इससे भावनगर और दक्षिण गुजरात (भरूच/सूरत) के बीच की दूरी करीब 240 किलोमीटर से घटकर लगभग 60 किलोमीटर रह जाएगी.
लागत
हालिया अनुमान लगभग ₹1,33,246 करोड़ (करीब 1.33 लाख करोड़ रुपये) का है.
समयरेखा
विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) अंतिम चरण में है. पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. निर्माण मई 2028 के आसपास शुरू होने और 2035 के अंत तक पूरा होने का लक्ष्य रखा गया है.
आर्थिक और सामाजिक लाभ
परियोजना का सबसे बड़ा लाभ सौराष्ट्र क्षेत्र को मिलेगा, जो लंबे समय से सूखे और पानी की कमी से जूझता रहा है.
सिंचाई
लगभग 9.99 से 10 लाख हेक्टेयर भूमि को सिंचाई सुविधा मिलेगी. यह सौराष्ट्र के नौ जिलों की 42 तहसीलों को कवर करेगी.
पेयजल और औद्योगिक पानी
घरेलू उपयोग के साथ-साथ उद्योगों (जैसे धोलेरा जैसे औद्योगिक क्षेत्रों) के लिए विश्वसनीय पानी की आपूर्ति होगी. इससे भूजल स्तर भी सुधरेगा.
भूमि पुनरुद्धार
ज्वार प्रभावित लगभग एक लाख हेक्टेयर भूमि विकास के लिए उपलब्ध हो सकती है
नवीकरणीय ऊर्जा
डाइक और पुनर्प्राप्त भूमि पर लगभग 1,500 मेगावाट पवन ऊर्जा और 1,000 मेगावाट सौर ऊर्जा (कुल मिलाकर करीब 2,500 मेगावाट हाइब्रिड क्षमता) का उत्पादन संभव बताया गया है.
अन्य लाभ
मत्स्य पालन, पर्यटन को बढ़ावा और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी में सुधार. कुछ आंकड़ों के अनुसार गांवों के विस्थापन का जोखिम बहुत कम या न के बराबर है, क्योंकि जलाशय समुद्री हिस्से में बनेगा.
वर्तमान स्थिति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग
यह परियोजना दशकों पुरानी अवधारणा है, जो 1980 के दशक से चर्चा में है. 2004 से व्यवहार्यता अध्ययन शुरू हुए थे. हाल के वर्षों में इसे नई गति मिली है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीदरलैंड यात्रा के दौरान भारत और नीदरलैंड के बीच तकनीकी सहयोग के लिए आशय पत्र (Letter of Intent) पर हस्ताक्षर हुए. नीदरलैंड की अफस्लुइटडाइक जैसी परियोजनाओं से सीख लेकर तटीय इंजीनियरिंग, लवणता प्रबंधन, जलवायु लचीलापन और जल प्रबंधन में विशेषज्ञता ली जा रही है.
गुजरात सरकार का कल्पसर विभाग इस पर काम कर रहा है. DPR के अंतिम होने के बाद राज्य और केंद्र सरकार की मंजूरी ली जाएगी.
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चुनौतियां और आगे का रास्ता
यह तकनीकी रूप से अत्यंत जटिल परियोजना है. समुद्र में इतने बड़े बांध का निर्माण, पर्यावरणीय प्रभाव, लवणता नियंत्रण, लागत और जलवायु परिवर्तन संबंधी जोखिम चुनौतियां हैं. फिर भी, अध्ययनों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से इन्हें संबोधित करने का प्रयास जारी है.
कल्पसर परियोजना अगर सफलतापूर्वक लागू होती है तो यह न केवल गुजरात बल्कि भारत के जल प्रबंधन के क्षेत्र में एक मिसाल बन सकती है. यह दिखाएगी कि कैसे नदियों के पानी को समुद्र में व्यर्थ बहने से रोककर सूखाग्रस्त क्षेत्रों की जल सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है और साथ ही व्यापक आर्थिक विकास को भी गति दी जा सकती है.
-भारत एक्सप्रेस
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