रिपोर्ट- मुकेश बैरागी
MP Kariya Pahad: मध्यप्रदेश के मंडला जिले से महज 35 किलोमीटर दूर रामनगर के पास खड़ा है एक पहाड़. जो बोल नहीं सकता, लेकिन अगर सुना जाए तो हजारों साल की कहानी सुना देता है. यह है करिया पहाड़, जहां इतिहास पत्थरों में लिखा गया और वर्तमान लापरवाही में मिटता जा रहा है. करिया पहाड़ सिर्फ भूगोल नहीं, यह गोंडवाना सभ्यता की आत्मा है.
करिया पहाड़ का इतिहास
इतिहासकार बताते हैं कि यह क्षेत्र आदिम मानव जीवन का साक्षी रहा है. यहां मौजूद शैलचित्र शिकार, उत्सव और सामूहिक जीवन के प्रमाण हैं. ये चित्र बताते हैं कि जब दुनिया सभ्यता की तलाश में थी, तब करिया पहाड़ पर सभ्यता सांस ले रही थी. गोंड राजाओं के समय यह पहाड़ सिर्फ प्राकृतिक दुर्ग नहीं, सांस्कृतिक केंद्र भी था आज भी करिया पहाड़ में एक अलग ही शांति है. यहां खड़े होकर लगता है मानो समय थम गया हो स्थानीय आदिवासी समाज आज भी इस पहाड़ को आस्था और पहचान से जोड़कर देखता है.
इको-टूरिज्म का मॉडल
अगर करिया पहाड़ पर ट्रेकिंग रूट, इन्फॉर्मेशन सेंटर और गाइड सिस्टम विकसित हो जाए तो यह जगह इको-टूरिज्म का मॉडल बन सकती है. युवाओं को रोजगार और जिले को और पहचान मिल सकती है. इतनी बड़ी धरोहर होने के बावजूद करिया पहाड़ प्रशासन की फाइलों में आज भी गुमनाम है. ना कोई सूचना का बोर्ड, ना सुरक्षा, और ना ही संरक्षण की ठोस योजना.
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स्थानीय लोग क्या कहते हैं?
अगर यही हाल रहा, तो आने वाले समय में यह इतिहास सिर्फ याद बनकर रह जाएगा. करिया पहाड़ आज दो रास्तों के बीच खड़ा है. एक रास्ता- संरक्षण, पर्यटन और सम्मान का तो दूसरा रास्ता- उपेक्षा का सवाल ये नहीं कि करिया पहाड़ में क्या है, सवाल ये है कि हम उसे बचाने के लिए क्या कर रहे हैं? क्या गोंडवाना इतिहास इतना कमजोर है कि उसे यूं ही मिटने दिया जाए? क्या विकास सिर्फ कागजों में होगा, या जमीन पर भी उतरेगा? और सबसे बड़ा सवाल- क्या करिया पहाड़संरक्षण का हकदार नहीं? करिया पहाड़ आज भी खड़ा है. हवा, बारिश और समय से लड़ता हुआ. लेकिन सवाल यही है कि क्या यह पहाड़ सिस्टम की बेरुखी से भी लड़ पाएगा? इतिहास को बचाना सिर्फ जिम्मेदारी नहीं, पहचान को बचाना है.
-भारत एक्सप्रेस
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