पश्चिम बंगाल में नाम बदलने की राजनीति के बीच कोलकाता की एक ऐतिहासिक सड़क ‘सुहरावर्दी एवेन्यू’ का नाम बदलकर हिंदू पाथफाइंडर और नायक गोपाल मुखर्जी के नाम पर रख दिया गया है. इस फैसले के बाद राज्य से लेकर दिल्ली तक की सियासत गरमा गई है. पूर्व केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने इस कदम का पुरजोर समर्थन करते हुए कहा कि जिसने जुल्म किया, उसके नाम पर देश की सड़कों का होना किसी भी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता. ऐसे में हुसैन शहीद सुहरावर्दी की क्रूर ऐतिहासिक भूमिका फिर से चर्चा में आ गई है, जिसे इतिहास में ‘बंगाल का कसाई’ कहा जाता है.
सत्ता और नाम बदलने के इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक बेहद दिलचस्प और अनसुना ऐतिहासिक मोड़ भी है, जिसे जाने बिना यह कहानी अधूरी है. आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर ‘बंगाल का कसाई’ कौन था और इस सड़क के नाम के पीछे का असली सच क्या है?
हुसैन नहीं, चाचा ‘हसन’ के नाम पर थी सड़क
राजनीति और जनभावनाओं के शोर में अक्सर इतिहास के बारीक पन्ने धुंधले हो जाते हैं. हकीकत यह है कि कोलकाता की इस प्रसिद्ध सड़क का नाम ‘बंगाल के कसाई’ हुसैन शहीद सुहरावर्दी के नाम पर नहीं, बल्कि उनके सगे चाचा सर हसन शहीद सुहरावर्दी के सम्मान में रखा गया था. दोनों एक ही प्रतिष्ठित परिवार से थे और नाम मिलते-जुलते होने के कारण दशकों से लोग इन्हें एक ही समझने की भूल करते आ रहे हैं. दोनों किरदारों की भारतीय इतिहास में भूमिकाएं बिल्कुल विपरीत थीं, इसलिए इस अंतर को समझना बेहद जरूरी है.
1. सर हसन सुहरावर्दी (चाचा): जिन्होंने गवर्नर की जान बचाई
सर हसन सुहरावर्दी अपने समय के एक बेहद प्रतिष्ठित डॉक्टर, महान शिक्षाविद और समाजसेवी थे. वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के पहले मुस्लिम कुलपति (वाइस चांसलर) बने. साल 1932 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह के दौरान महिला क्रांतिकारी बीना दास ने बंगाल के ब्रिटिश गवर्नर स्टेनली जैक्सन पर अंधाधुंध गोलियां चला दी थीं. उस वक्त हसन सुहरावर्दी ने अपनी जान पर खेलकर गवर्नर की जान बचाई थी.
उनकी इस बहादुरी के लिए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें ‘सर’ (नाइटहुड) की मानद उपाधि दी थी. 8 मार्च 1933 को कलकत्ता नगर निगम ने उन्हीं के जीवित रहते उनके सम्मान में पार्क सर्कस की इस नई सड़क का नाम ‘सुहरावर्दी एवेन्यू’ रखा था, क्योंकि इसी सड़क पर उनका निजी आवास ‘काशाना’ स्थित था.
2. हुसैन शहीद सुहरावर्दी (भतीजा): जिसे कहा गया ‘बंगाल का कसाई’
दूसरी ओर, हसन सुहरावर्दी के भतीजे हुसैन शहीद सुहरावर्दी का रास्ता पूरी तरह अलग और विवादित था. वे मुस्लिम लीग के बड़े नेता थे और पाकिस्तान आंदोलन के कट्टर समर्थक थे. डायरेक्ट एक्शन डे (16 अगस्त 1946) पर कोलकाता के भीषण सांप्रदायिक दंगों के दौरान हुसैन शहीद सुहरावर्दी बंगाल के मुख्यमंत्री/सिविल सप्लाई मंत्री थे.
उन पर आरोप है कि उन्होंने जान-बूझकर पुलिस को दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई करने से रोका और उनके भड़काऊ भाषणों ने हिंसा की आग में घी का काम किया. इस नरसंहार में हजारों बेगुनाह लोग मारे गए, जिसके चलते इतिहास में उनका नाम ‘बंगाल का कसाई’ पड़ गया. देश के विभाजन के बाद वे पाकिस्तान चले गए और साल 1956 में वहां के पांचवें प्रधानमंत्री बने.
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सुहरावर्दी का वो ऐतिहासिक ‘काशाना’
पार्क सर्कस स्थित जिस लाल ईंटों से बने दो मंजिला भवन (काशाना) में कभी सर हसन सुहरावर्दी रहते थे, आज वह इमारत बांग्लादेश हाई कमीशन लाइब्रेरी एंड इंफॉर्मेशन सेंटर के रूप में इस्तेमाल की जा रही है. मुख्य द्वार पर आज भी संगमरमर की पट्टी पर सर हसन सुहरावर्दी का नाम लिखा हुआ है. हालांकि, विडंबना यह है कि इस ऐतिहासिक भवन के भीतर बांग्लादेश के तमाम नेताओं की तस्वीरें तो हैं, लेकिन उस महापुरुष (हसन सुहरावर्दी) की कोई तस्वीर नहीं है जिन्होंने इस धरोहर को बनाया था.
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