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देशभक्ति पर आपत्ति, आतंकवाद पर खामोशी ? मुस्लिम नेतृत्व ने मौलाना मदनी की दोहरी राजनीति को बेनकाब किया

मौलाना महमूद मदनी द्वारा “वंदे मातरम् इस्लाम-विरोधी” कहने पर मुस्लिम नेतृत्व ने खुलकर विरोध किया. मुस्लिम राष्ट्रीय मंच, NCMEI, सूफी संगठन और कई आलिमों ने कहा कि ऐसे बयान मुसलमानों को मुख्यधारा से दूर करते हैं और समाज में दूरी बढ़ाते हैं.

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Edited by Sahil Singh

मौलाना महमूद मदनी ने एक बार फिर यह विवाद खड़ा कर दिया कि ‘वंदे मातरम् इस्लाम-विरोधी है’. यह बात सुनते ही पूरे देश में बहस तेज हो गई, लेकिन इस बार सबसे बड़ा जवाब उन्हें बाहर से नहीं, बल्कि अपने ही समुदाय से मिला. देश के नामी मुस्लिम बुद्धिजीवी, सामाजिक संगठन और कई धार्मिक हस्तियां एकमत होकर कह रही हैं कि ऐसे बयानों से मुसलमानों का भला नहीं होता. इससे हमारी छवि को नुकसान पहुंचता है और युवा पीढ़ी को गलत दिशा मिलती है. उनका कहना है कि भारत के मुसलमानों को अब डर की राजनीति नहीं चाहिए. उन्हें शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा और समान अवसर चाहिए.

MRM का बड़ा बयान

मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (MRM) के राष्ट्रीय प्रवक्ता शाहिद सईद ने कहा कि मौलाना मदनी का बयान मुसलमानों को मुख्यधारा से दूर ले जाने वाला है. उन्होंने जोर देकर कहा कि भारतीय मुसलमान दुनिया के सबसे सुरक्षित और सम्मानित मुसलमानों में गिने जाते हैं. देश की सेना, नौकरशाही, न्यायपालिका, खेल, विज्ञान और कला, हर जगह मुस्लिम युवा चमक रहे हैं. ऐसे में बार-बार घबराहट और अलगाव की कहानी फैलाना केवल नफरत को बढ़ाता है. शाहिद सईद ने साफ कहा कि ‘वंदे मातरम् पर सवाल उठाना आजादी की लड़ाई और भारत माता के सम्मान को ठुकराने जैसा है. इसमें कहीं भी शिर्क नहीं, इसमें तो सिर्फ मातृभूमि का सम्मान है, जैसा सम्मान पैगंबर मुहम्मद (स.) ने मदीना की धरती को दिया था.’

मंच की राष्ट्रीय संयोजक और महिला नेतृत्व की प्रमुख आवाज डॉ. शालिनी अली ने कहा कि भारत के मुसलमानों को आगे बढ़ाने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, स्किल डेवलपमेंट और रोजगार की जरूरत है, न कि ऐसे मुद्दों की जो हमें बाकी समाज से टकराव की ओर ले जाएं. उन्होंने स्पष्ट कहा कि जो लोग मुसलमानों और हिंदुओं के बीच दूरी बढ़ाते हैं, वही सबसे बड़े दुश्मन हैं. भारतीय मुसलमान शांति, मेहनत और देश के साथ खड़े होने की परंपरा रखते हैं और यह परंपरा किसी कट्टर बयान से नहीं टूट सकती.

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान आयोग (NCMEI) के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. शाहिद अख्तर ने कहा कि इस्लाम और देशभक्ति एक-दूसरे के खिलाफ नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं. इस्लाम इंसाफ, अमन और भाईचारे का पैगाम देता है. उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् पर विवाद खड़ा कर मुसलमानों को भटकाने की कोशिश हो रही है. असली चुनौती तो आतंकवाद, कट्टरता, गरीबी और पिछड़ापन है न कि राष्ट्रगीत.

“आतंकवाद पर खुलकर बोलें मौलाना महमूद मदनी”

जमीयत हिमायतुल इस्लाम के मशहूर आलिम मौलाना कारी अबरार जमाल कासमी ने और भी तीखा सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि अगर मौलाना मदनी को वाकई मुसलमानों की चिंता है तो वे आतंकवाद पर खुलकर बोलें. “आतंकवाद इस्लाम को सबसे ज्यादा बदनाम करता है. आतंकवाद पर खामोशी और वंदे मातरम् पर शोर यह दोहरा मापदंड क्यों ?” कारी जमाल ने कहा कि करोड़ों हिंदू भाइयों की भावनाओं को आहत कर के हम किसी भी तरह अपनी छवि सुधार नहीं सकते, बल्कि देश से दूरी ही बढ़ती है.

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सूफी संत और सज्जादानशीन शाह सैय्यद जियारत अली मलंग हक्कानी ने पूरी बहस पर अंतिम मुहर लगाते हुए कहा कि इस्लाम की तहजीब, पहचान और मूल संदेश-सब प्यार, मोहब्बत और इंसानियत पर खड़े हैं. धर्म का रास्ता जोड़ने का है, तोड़ने का नहीं. उन्होंने कहा कि मुसलमानों की लड़ाई गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा और सामाजिक पिछड़ेपन से है, किसी भी राष्ट्र-प्रतीक से नहीं. जो बयान समाज को बांटते हों, वे इस्लाम के भी नहीं, भारत के भी नहीं, और मुसलमानों के भी नहीं.

-भारत एक्सप्रेस



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