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गांधी जी और संघ के रिश्तों की कहानी, संवाद और विवाद के बीच की सच्चाई

महात्मा गांधी की हत्या के बाद RSS पर लगे आरोपों और प्रतिबंधों की कहानी के साथ जानिए महात्मा गांधी और संघ के बीच के संवाद, सम्मान और ऐतिहासिक घटनाएं.

Mahatma Gandhi & RSS

महात्मा गांधी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर संलिप्तता का आरोप लगा और यही संघ पर लगे पहले सरकारी प्रतिबंध की वजह बना. हालांकि बाद में जांच में यह आरोप गलत साबित हुए और सरकार ने प्रतिबंध हटा लिया. लेकिन आज भी संघ के विरोधी इन आरोपों को दोहराते हैं और संघ को इस जिम्मेदारी से मुक्त करने को तैयार नहीं हैं. दूसरी ओर संघ हमेशा इन आरोपों को सिरे से खारिज करता रहा है.

तत्कालीन संघ प्रमुख की प्रतिक्रिया

महात्मा गांधी की हत्या के समय संघ प्रमुख माधवराव गोलवलकर (गुरुजी) मद्रास में थे. जैसे ही उन्हें यह दुखद समाचार मिला. उन्होंने तत्काल नेहरू, पटेल और देवदास गांधी को तार भेजकर अपना दुख और आक्रोश व्यक्त किया. उन्होंने महात्मा गांधी को महान व्यक्तित्व और अद्वितीय संगठक बताया और इस क्रूर हत्या की कड़ी निंदा की. उसी दिन उन्होंने संघ की सभी शाखाओं को निर्देश दिया कि गांधी जी के निधन पर तेरह दिन का शोक मनाया जाए और सभी गतिविधियां स्थगित कर दी जाएं.

गुरुजी का नेहरू को पत्र

गुरुजी ने गोडसे की कड़ी निंदा करते हुए नेहरू को पत्र लिखा जिसमें उन्होंने कहा कि यह कुकृत्य न केवल महात्मा गांधी बल्कि पूरे राष्ट्र के साथ विश्वासघात है. उन्होंने यह भी कहा कि चाहे गोडसे को कितनी भी कठोर सजा दी जाए वह हमारे शोक के सामने कम ही लगेगी.

संघ पर प्रतिबंध

उस समय संघ के खिलाफ माहौल बेहद नकारात्मक था. सरकार ने 4 फरवरी को संघ पर प्रतिबंध लगा दिया और अगले दिन 20 हजार से ज्यादा स्वयंसेवकों को गिरफ्तार कर लिया गया. संघ विचारक एम.जी. वैद्य कि माने तो उस वक्त जनता, सरकार और मीडिया सभी संघ के खिलाफ थे. गोडसे को संघ का सदस्य मानकर संघ से जुड़े लोगों पर जगह-जगह गुस्सा निकाला जा रहा था.

गोडसे ने क्या स्वीकार किया था?

हालांकि गोडसे ने खुद भी स्वीकार किया था कि वह हत्या के समय संघ का सदस्य नहीं था. संघ से उसका पहले ही मतभेद हो चुका था और वह संघ को ‘धीमा चलने वाला’ कहकर आलोचना करता था. 1965 में गठित जस्टिस जे.एल. कपूर आयोग ने 1969 में अपनी रिपोर्ट में साफ कहा कि गांधी हत्या षड्यंत्र में संघ का कोई संबंध नहीं था.

संघ और गांधी के बीच संवाद

संघ और महात्मा गांधी के बीच संवाद और सम्मान का रिश्ता रहा है. 1946 में संघ शिक्षा वर्ग में गुरुजी ने महात्मा गांधी को ‘विश्व वंदनीय’ बताया था. संघ के गीत में उन्हें ‘प्रातः स्मरणीय महापुरुष’ माना गया है. यह सम्मान गांधी जी के जीवित रहते ही उन्हें दिया गया था.

एक मुलाकात ये भी

1934 में गांधी जी वर्धा में संघ के शिविर में स्वयंसेवकों से मिले थे. उन्होंने अनुशासन, छुआछूत के त्याग और सादगी से प्रभावित होकर कहा था, ‘मैं बहुत प्रभावित हुआ.’ 1947 में स्वतंत्रता और विभाजन के बीच गांधी जी ने गुरुजी से बिड़ला हाउस में मुलाकात की थी. उन्होंने दिल्ली और कलकत्ता में संघ से जुड़ी शिकायतें साझा कीं थी. जिन पर गुरुजी ने स्पष्ट किया कि संघ किसी भी समुदाय को नहीं धमकाता है और उसकी नीति हिंदुओं की सेवा की है.

महात्मा गांधी ने इस भेंट के बाद अपनी प्रार्थना सभा में गुरुजी की चिंता का उल्लेख किया और संघ से शांति की अपील करने को कहा. गुरुजी ने यह अपील जारी की. जो आकाशवाणी पर प्रसारित और अखबारों में प्रकाशित हुई.

महात्मा गांधी ने संघ को किया था संबोधित

16 सितंबर 1947 को गांधी जी ने दिल्ली की भंगी कॉलोनी में संघ के 500 स्वयंसेवकों को संबोधित किया. उन्होंने 1934 के वर्धा शिविर की याद दिलाते हुए कहा,

“मैं वहां अनुशासन की भावना, छुआछूत के संपूर्ण त्याग और सादगी भरी रूटीन से बहुत प्रभावित हुआ था. कोई भी संगठन जो सेवा और आत्म-बलिदान के उच्च आदर्शों से प्रेरित हो अपनी शक्ति बढ़ाए बिना नहीं रह सकता.”

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संघ और गांधी जी के रिश्ते में सम्मान, संवाद और सहयोग की भावना रही है. हत्या के आरोपों के बावजूद संघ ने गांधी जी को हमेशा श्रद्धा और आदर से देखा है. शताब्दी वर्ष के मौके पर यह कहानी बताती है कि इतिहास को समझने के लिए सिर्फ आरोप नहीं तथ्य भी जरूरी हैं.

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-भारत एक्सप्रेस



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