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Mayawati का ‘स्कोर हो जाएगा जीरो’, 36 साल बाद यहां BSP का झंडा उठाने वाला कोई नहीं

Lucknow: Bahujan Samaj Party (BSP) supremo Mayawati

BSP चीफ मायावती

‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय.’ ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु महेश है.’ ‘ठाकुर, बनिया, बाभन छोड़, बाकी सब हैं DS-4.’ इन नारों के साथ जब बहुजन समाज पार्टी चुनावी मैदान में उतरी तो ऐसा लगा कि न सिर्फ उत्तर प्रदेश की राजनीति, बल्कि देश की सियासत में एक नया उबाल पैदा कर दिया हो. देश के सबसे बड़े सियासी सूबे में हर तरफ नीला झंडा और उस पर छपे सफेद रंग में हाथी नजर आने लगा. हर तरफ बस एक ही नाम का शोर सुनाई पड़ता था. पोस्टर-बैनर में बस एक ही चेहरा दिखाई देता था. बहन कुमारी मायावती.

मर्यादित भाषण मायावती की पहचान

अपने सख्त लहजे और जोशीले भाषण के साथ मायावती जब मंच पर होती थीं तो न सिर्फ विरोधियों के तेवर ढ़ीले कर देती, बल्कि अपने कार्यकर्ताओं में जोश भर देती थीं. मायावती के भाषणों में विरोधियों के लिए मर्यादा नजर आती थी तो अपने कार्यकर्ताओं के लिए भावुकता. यही कारण रहा कि बीएसपी के कार्यकर्ताओं ने अपने नेता बहन कुमारी मायावती को फर्श से अर्श पर पहुंचा दिया. कार्यकर्ताओं के हाई जोश का ही नतीजा रहा कि मायावती उत्तर प्रदेश के सबसे ऊंचे राजनीतिक पद तक पहुंची.

संसद की सियासत को हिलाने वाला नेता

कभी उत्तर प्रदेश की राजनीति के संसद की सियासत को अपने मन मुताबिक हिलाने वाली मायावती का ‘स्कोर जल्द ही उसी संसद में जीरो’ हो जाएगा. लोकसभा में जीरो पर आउट हो चुकी बहन कुमारी मायावती की पार्टी इसी साल राज्यसभा में भी जीरो हो जाएगी. बीएसपी के एकमात्र राज्यसभा सांसद रामजी गौतम का कार्यकाल नवंबर 2026 में खत्म हो जाएगा. ऐसा पहली बार होगा जबकि 36 साल बाद पहली बार संसद के दोनों सदनों में बसपा का कोई सदस्य नहीं होगा.

मात्र 42 साल में ‘कोई नहीं’

यूं तो कहावत है कि राजनीति में 40 साल के बाद ही लोग जवान होते हैं. लेकिन, जरा सोचिए कि मात्र 42 साल में किसी राष्ट्रीय पार्टी का कोई प्रतिनिधि संसद में न रहे तो उस पार्टी पर क्या गुजरेगी? कभी राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल कर केंद्र सरकार को अपनी शर्तों पर झुकाने वाली मायावती की पार्टी बीएसपी का यह भी दर्जा छिन सकता है. कभी अपने सांसदों के दम पर संसद में सरकार पलट देने वाली पार्टी आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है. मायावती के पास वोटों की ताकत ऐसी थी कि हर दल उन्हें अपने पाले में लेना चाहता था.

‘न सहारा, न तारणहार’

लेकिन, आज. आज मायावती राजनीति के उस दौर से गुजर रही हैं जहां न तो कोई सहारा दिख रहा है और न हीं कोई तारणहार. किसी वक्त में पलक पावड़े बिछाने वाले लोग भी आज उनसे दूरी बनाए हुए हैं. कभी मायावती और बीएसपी के लिए कालीन बिछाने वाले दल भी उनसे किनारा कर लिए हैं. कभी केंद्र सरकार की आंख में आंख डालकर बात करने वाली पार्टी बीएसपी और उनके समर्थक मायावती को प्रधानमंत्री के दावेदार के तौर पर देखते थे. लेकिन, आज मायावती संसद के दोनों सदनों में एक सीट के लिए तरस रही हैं.

बीएसपी का इतिहास

बहुजन समाज पार्टी का गठन साल 1984 में हुआ. गठन के बाद बसपा तेज रफ्तार से आगे बढ़ती चली गई. इसी दौरान कांशीराम के सधे हुए राजनीतिक चाल और मायावती के मर्यादित कदम से बीएसपी दलितों की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन गई. अपने कार्यकर्ताओं और वोटरों के बल पर बीएसपी सिर्फ क्षेत्रीय दल के तौर पर ही मजबूत नहीं हुई बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी उसका कद काफी मजबूत हो चुका था. साल 2009 में बीएसपी ने 6.17% वोट शेयर के साथ 21 लोकसभा सीटें जीतीं और राष्ट्रीय स्तर पर तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी.

2019 में 10 सीट

साल 2014 में नरेंद्र मोदी की लहर के बीच बीएसपी लोकसभा चुनाव में एक भी सीट पर जीत नहीं हासिल कर सकी. हालांकि पार्टी ने 4.19% वोट हासिल किए. उसके बाद साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी-एसपी गठबंधन कर उत्तर प्रदेश के चुनावी मैदान में उतरे. इस चुनाव में बीएसपी ने दस सीटों पर जीत हासिल की. लेकिन कुछ ही दिन बाद दोनों दलों के बीच गठबंधन टूट गया.

गिरता गया BSP का ग्राफ

साल 2024 के चुनाव आते-आते बीएसपी का ग्राफ गिरता चला गया और पार्टी का वोट शेयर मात्र 2.07 प्रतिशत तक पहुंच गया. बीएसपी के एक भी उम्मीदवार जीत हासिल कर संसद नहीं पहुंचे. इसके अलावा यूपी विधानसभा में भी बीएसपी की स्थिति बेहद खराब है. साल 2022 के चुनाव में मायावती की पार्टी का सिर्फ एक विधायक ही चुनाव जीत पाया. वहीं, विधानपरिषद में भी बीएसपी की स्थिति शून्य है.

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