'मिनी संसद' में बढ़ेगी शशि थरूर की जिम्मेदारी
देश में कांग्रेस नेता शशि थरूर के बयानों की चर्चा बनी रहती है. पीएम मोदी से उनकी करीबी और कई मौकों पर सरकार के पक्ष में खड़ा होना किसी से छिपा नहीं है. वह अपनी ही पार्टी के भीतर कई बार अपने मुखर बयानों के लिए निशाने पर आते रहते हैं. इस बीच संसद की स्थायी समितियों के कामकाज और उनकी प्रभावशीलता को बढ़ाने के लिए मोदी सरकार एक महत्वपूर्ण बदलाव की तैयारी में है. सूत्रों के अनुसार, इन समितियों का कार्यकाल वर्तमान एक साल से बढ़ाकर दो साल किया जा सकता है. यह कदम केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक तौर पर भी खासा अहम है. इस बदलाव का सीधा फायदा कांग्रेस सांसद शशि थरूर को मिलने वाला है.
थरूर वर्तमान में विदेश मामलों की स्थायी समिति के अध्यक्ष हैं. कार्यकाल बढ़ने से वह पार्टी से हालिया मतभेदों के बावजूद अगले दो साल तक इस महत्वपूर्ण पद पर बने रह सकते हैं. अगर ऐसा होता है तो उन्हें सीधे तौर पर लाभ होगा. दूसरी ओर देश में नई सियासी बहस भी पैदा हो सकती है.
‘मिनी संसद’ में बढ़ेगी शशि थरूर की जिम्मेदारी
मोदी सरकार संसद की स्थायी समितियों का कार्यकाल एक साल से बढ़ाकर दो साल करने की तैयारी कर रही है. इसका फायदा कांग्रेस सांसद शशि थरूर को मिल सकता है, जो वर्तमान में विदेश मामलों की स्थायी समिति के अध्यक्ष हैं.
क्या है संसदीय स्थायी समितियां?
संसदीय स्थायी समितियां संसद की स्थायी इकाइयां होती हैं, जिनमें लोकसभा और राज्यसभा दोनों के सांसद शामिल होते हैं. ये समितियां विधेयकों की जांच, सरकारी नीतियों की समीक्षा और बजट आवंटन की पड़ताल करती हैं. साथ ही मंत्रालयों को जवाबदेह भी ठहराती हैं. इस समिति की ताकत तब और बढ़ जाती है जब संसद नहीं चल रही होती है. इसी कारण इसे कई बार मिनी संसद कहा जाता है.
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क्यों जरूरी है कार्यकाल बढ़ाना?
विपक्ष समेत कई सांसदों का मानना है कि एक साल का कार्यकाल पर्याप्त नहीं होता. इसलिए इसे बढ़ाकर कम से कम दो साल किया जाए, ताकि समितियां गहन अध्ययन कर सकें. इससे समितियों को अधिक निरंतरता और गहराई से विधेयकों, रिपोर्टों और नीतिगत मामलों की जांच करने का अवसर मिलेगा.
- यह बदलाव संसदीय कार्यवाही में निरंतरता और गहराई लाने में मदद करेगा.
- समितियां अधिक प्रभावी ढंग से काम कर पाएंगी और अपनी रिपोर्ट पेश कर सकेंगी.
- संसदीय लोकतंत्र को मजबूत करने में मदद मिलेगी.
स्थायी समितियों के अध्यक्षों में बड़े बदलाव की संभावना कम है, लेकिन नए नियुक्त सदस्यों का कार्यकाल एक साल से बढ़कर दो साल हो सकता है. इससे समितियां ज्यादा निरंतरता और फोकस के साथ काम कर पाएंगी. शशि थरूर अपने पद पर दो साल और बने रह सकते हैं, अगर स्थायी समितियों का कार्यकाल दो साल का कर दिया जाता है.
जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम
संसद के सत्र न होने पर ‘मिनी संसद’ की तरह काम करने वाली ये स्थायी समितियां विधेयकों और सरकारी नीतियों की गहन समीक्षा करती हैं. कई सांसदों की लंबे समय से मांग रही है कि एक साल का कार्यकाल गहन अध्ययन के लिए पर्याप्त नहीं होता, जिससे निरंतरता टूट जाती है. कार्यकाल को दो साल तक बढ़ाने का उद्देश्य इसी निरंतरता को लाना और विधेयकों की गहराई से जांच सुनिश्चित करना है. यह निर्णय, जिसका राजनीतिक निहितार्थ भी है, संसदीय कामकाज को अधिक प्रभावी बनाने और मंत्रालयों की जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है.
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