डकैतों का आतंक खत्म, फिर भी क्यों लागू है 45 साल पुराना कानून (इमेज- Bharat Express)
रिपोर्ट- मनोज चौबे (ग्वालियर)
Chambal Dacoity Law: मध्य प्रदेश का ग्वालियर-चंबल अंचल एक समय डकैतों के आतंक के लिए जाना जाता था. 1970 से 1980 के दशक तक इस इलाके में दस्यु गिरोहों का खौफ इस कदर था कि कई गांवों में लोगों का घर से निकलना तक मुश्किल हो जाता था. डकैती और अपहरण की घटनाओं पर काबू पाने के लिए मध्य प्रदेश सरकार ने विशेष कानून बनाया था. हालांकि अब करीब 45 साल पुराने इसी कानून को खत्म करने की मांग को लेकर मामला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट पहुंच गया है.
लहार से पूर्व विधायक और पूर्व नेता प्रतिपक्ष डॉ. गोविंद सिंह ने इस कानून की मौजूदा जरूरत और इसके इस्तेमाल को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की है. सात बार विधायक और पूर्व मंत्री रहे डॉ. गोविंद सिंह की याचिका पर जस्टिस जीएस अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की डिवीजन बेंच ने मामले से जुड़े सभी प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया है.
प्रमुख सचिव और डीजीपी समेत अधिकारियों को नोटिस
मामले में गृह विभाग के प्रमुख सचिव, विधि विभाग के सचिव, मध्य प्रदेश के डीजीपी, ग्वालियर जोन के आईजी, चंबल रेंज के आईजी समेत सात जिलों के पुलिस अधीक्षकों को पक्षकार बनाया गया है. इनमें ग्वालियर, भिंड, मुरैना, श्योपुर, शिवपुरी, दतिया और गुना के एसपी शामिल हैं.
डॉ. गोविंद सिंह की ओर से सीनियर एडवोकेट विवेक कुमार तन्खा और पूर्व अतिरिक्त महाधिवक्ता राजीव शर्मा ने पैरवी की. 8 सितंबर को हुई सुनवाई के दौरान याचिका की प्रार्थना में संशोधन भी किया गया.
क्या कहती है कानून की धारा-3?
इस मामले में कानून की धारा-3 बेहद अहम है. यही धारा तय करती है कि किसी इलाके को ‘डकैती और अपहरण प्रभावित क्षेत्र’ घोषित करने की प्रक्रिया क्या होगी.
इसके तहत सरकार को संबंधित क्षेत्र में डकैती और अपहरण की स्थिति, अपराध से जुड़े आंकड़े और पुलिस रिपोर्ट समेत अन्य सामग्री पर विचार करना होता है. इसके बाद सरकार अधिसूचना जारी कर किसी पूरे जिले या उसके किसी हिस्से को इस विशेष कानून के दायरे में ला सकती है.
याचिका में इसी प्रावधान के मौजूदा इस्तेमाल पर सवाल उठाया गया है. याचिकाकर्ता का कहना है कि समय के साथ इस क्षेत्र में सक्रिय रहे कई कुख्यात डकैत गिरोह खत्म हो चुके हैं. इसके बावजूद विशेष कानून अभी भी लागू है.
एसपी से मांगी जा सकती है जानकारी
ग्वालियर, भिंड, मुरैना, श्योपुर, शिवपुरी, दतिया और गुना के एसपी को मामले में पक्षकार बनाए जाने का एक अहम कारण इन क्षेत्रों की मौजूदा स्थिति भी है. ये जिले लंबे समय तक दस्यु समस्या से प्रभावित रहे हैं.
अब पुलिस अधीक्षकों से यह स्पष्ट हो सकता है कि इन जिलों में वर्तमान में डकैती और अपहरण की स्थिति क्या है और क्या इस विशेष कानून की अब भी जरूरत है. यानी अदालत के सामने यह सवाल भी महत्वपूर्ण होगा कि जिस समस्या से निपटने के लिए कानून बनाया गया था, क्या वह समस्या आज भी उसी रूप में मौजूद है?
2022 में सरकार ने विधानसभा में दी थी जानकारी
मध्य प्रदेश सरकार ने दिसंबर 2022 में विधानसभा में जानकारी दी थी कि यह कानून ग्वालियर, मुरैना, भिंड, श्योपुर, शिवपुरी और दतिया जिलों में प्रभावी है.
याचिका में 2017 से अब तक इस कानून के तहत दर्ज मामलों और एफआईआर का ब्योरा भी मांगा गया है. याचिकाकर्ता ने यह सवाल उठाया है कि जब क्षेत्र में पुराने दौर के कुख्यात डकैत गिरोह अब सक्रिय नहीं हैं, तो इस विशेष कानून का इस्तेमाल किन परिस्थितियों में किया जा रहा है.
कभी डकैतों का गढ़ था चंबल
ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में 1970 से 1980 के दशक तक दस्यु समस्या बेहद गंभीर रही. कई कुख्यात डकैत गिरोहों ने इस इलाके में लंबे समय तक आतंक कायम रखा. मान सिंह, पान सिंह, भंवर सिंह, फूलन देवी और रामबाबू गडरिया जैसे नाम चंबल के दस्यु इतिहास से जुड़े रहे हैं.
कई घटनाओं में सामूहिक हत्याओं और अपहरण ने पूरे इलाके में दहशत पैदा कर दी थी. बाद के वर्षों में पुलिस कार्रवाई, आत्मसमर्पण और सरकार की विभिन्न नीतियों के जरिए दस्यु समस्या पर काफी हद तक नियंत्रण पाया गया.
जब डकैत ही नहीं तो कानून क्यों?
चंबल के पूर्व दस्यु मलखान सिंह ने भी इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दी है. हमारे संवाददाता मनोज चौबे से बातचीत में उन्होंने कहा कि चंबल में डकैतों की समस्या मुख्य रूप से 1970 और 1980 के दशक में थी. उस दौर में कई बड़े डकैत गिरोह सक्रिय थे, लेकिन समय के साथ अधिकांश गिरोह खत्म हो गए.
मलखान सिंह ने कहा कि उन्होंने खुद अर्जुन सिंह की सरकार के समय आत्मसमर्पण किया था. इसके बाद मध्य प्रदेश में कई सरकारें आईं और चली गईं, लेकिन यह कानून अब तक नहीं बदला.
उन्होंने सवाल उठाया कि जब ग्वालियर-चंबल अंचल में अब पहले जैसी डकैत समस्या नहीं है, तो इस विशेष कानून की जरूरत आखिर क्यों बनी हुई है. उन्होंने कहा कि अगर किसी कानून की जरूरत नहीं है तो उसके जरिए आम लोगों को परेशान नहीं किया जाना चाहिए.
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मलखान सिंह ने डॉ. गोविंद सिंह की पहल की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है. उन्होंने सरकार से भी सवाल किया कि जब क्षेत्र में डकैतों का वह दौर खत्म हो चुका है, तो पुराने कानून को अब तक क्यों जारी रखा गया है.
अब सरकार के जवाब पर टिकी नजर
फिलहाल हाईकोर्ट ने मामले में सरकार और संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा है. अब अगली सुनवाई में सरकार इस 45 साल पुराने विशेष कानून की मौजूदा जरूरत और इसके इस्तेमाल को लेकर अपना पक्ष रखेगी. इसके बाद अदालत यह तय करेगी कि इस कानून को लेकर आगे क्या कार्रवाई की जानी है.
-भारत एक्सप्रेस
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