Parliament Monsoon Session Running Cost: संसद का मॉनसून सत्र खत्म होने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर देश की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक संस्था में इन दिनों कितना काम हुआ और कितना समय हंगामे की भेंट चढ़ गया. सरकार की ओर से यह जरूर कहा जा सकता है कि सत्र के दौरान लोकसभा और राज्यसभा ने मिलकर करीब 20 विधेयकों को मंजूरी दी. लेकिन विपक्ष का आरोप है कि इनमें से ज्यादातर बिल बिना पर्याप्त चर्चा के शोर-शराबे और हंगामे के बीच पास कराए गए.
यानी तस्वीर कुछ ऐसी रही कि सदन चलता भी रहा और लगातार बाधित भी होता रहा. इसी वजह से संसद के कामकाज और उस पर होने वाले खर्च को लेकर सवाल उठ रहे हैं.
7,023 मिनट नहीं चला जरूरी काम
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, इस मॉनसून सत्र में करीब 7,023 मिनट का संसदीय समय बर्बाद हुआ है. संसद की कार्यवाही चलाने में हर मिनट बड़ी रकम खर्च होती है. लोकसभा के मामले में प्रति मिनट कामकाज की लागत करीब 2.5 लाख रुपये (cost of Parliament proceedings) बताई जाती है.
अगर इसी आधार पर हिसाब लगाया जाए तो 7,023 मिनट की कार्यवाही बाधित होने से करीब 175 करोड़ रुपये के बराबर संसदीय समय का नुकसान हुआ है. यह आंकड़ा सुनने में बड़ा लग सकता है, लेकिन इसके पीछे सिर्फ पैसा ही मुद्दा नहीं है. असली सवाल यह है कि जिन घंटों के लिए जनता के चुने हुए सांसद संसद में बैठते हैं, उनका कितना इस्तेमाल कानून बनाने, सरकार से सवाल पूछने और देश से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करने में हुआ.
हंगामा संसद के लिए नया नहीं
हालांकि, संसद में हंगामा और कार्यवाही का बार-बार बाधित होना कोई नई बात नहीं है. पिछले डेढ़ दशक में कई ऐसे सत्र रहे हैं जब राजनीतिक टकराव इतना बढ़ गया कि सदन की बड़ी अवधि चर्चा के बजाय नारेबाजी और विरोध में निकल गई.
2010 का शीतकालीन सत्र इसका बड़ा उदाहरण है. उस समय 2G स्पेक्ट्रम मामले को लेकर विपक्ष संयुक्त संसदीय समिति यानी JPC की मांग पर अड़ा हुआ था. लगातार हंगामे के कारण सदन का कामकाज बुरी तरह प्रभावित हुआ.
2012 के मॉनसून सत्र में भी कॉमनवेल्थ गेम्स और लोकपाल जैसे मुद्दों को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच जोरदार टकराव देखने को मिला. उस दौरान लोकसभा के लिए तय करीब 60 घंटे में से सिर्फ 23 घंटे ही काम हो पाया था.
2015 से लेकर 2023 तक भी कई सत्र रहे प्रभावित
2015 का मॉनसून सत्र व्यापम घोटाले और ललित मोदी प्रकरण को लेकर विपक्ष के विरोध के कारण खासा हंगामेदार रहा. इस सत्र में लोकसभा का करीब 46 फीसदी कामकाज ही हो सका था.
इसके अगले साल यानी 2016 में नोटबंदी के मुद्दे ने संसद को लंबे समय तक गरमाए रखा. सरकार और विपक्ष के बीच लगातार टकराव के चलते शीतकालीन सत्र में लोकसभा के करीब 92 घंटे बर्बाद हुए.
2018 भी संसद के लिए शांत साल नहीं रहा. बजट सत्र के दूसरे चरण में बैंकिंग घोटालों और अविश्वास प्रस्ताव को लेकर गतिरोध बना रहा. उसी साल मॉनसून सत्र में राफेल सौदे और अविश्वास प्रस्ताव को लेकर विपक्ष ने सरकार को घेरा. नतीजा यह हुआ कि उस सत्र में सिर्फ करीब 15 फीसदी कामकाज ही हो सका.
2023 का मॉनसून सत्र भी मणिपुर हिंसा के मुद्दे पर लगातार हंगामे की वजह से प्रभावित रहा. विपक्ष प्रधानमंत्री के बयान और मणिपुर पर चर्चा की मांग कर रहा था, जबकि सरकार की ओर से अन्य विधायी काम आगे बढ़ाने की कोशिश होती रही.
बिल पास हुए, लेकिन बहस कितनी हुई?
2026 के मॉनसून सत्र की सबसे दिलचस्प बात यही है कि एक तरफ कार्यवाही बाधित होने का आंकड़ा हजारों मिनट में पहुंच गया, तो दूसरी तरफ सरकार कई महत्वपूर्ण विधेयक पारित कराने में सफल रही. इससे बहस एक अहम सवाल पर आकर टिक जाती है. क्या संसद का काम सिर्फ बिल पास करना है या उन पर विस्तार से चर्चा करना भी उतना ही जरूरी है?
संसद में कानून बनते हैं, लेकिन कानून का असर सीधे आम लोगों की जिंदगी पर पड़ता है. इसलिए विपक्ष की आपत्तियां, सांसदों के सुझाव और विशेषज्ञों की बातों पर चर्चा लोकतांत्रिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है. हंगामे और वॉकआउट के बीच बिल पास होने से सरकार अपना विधायी एजेंडा तो पूरा कर सकती है, लेकिन इससे संसद में सार्थक बहस को लेकर सवाल जरूर खड़े होते हैं.
ये भी पढ़ें: अल्टीमेटम पर एक्शन में मनन मिश्रा! NALSAR मामले में दीपके को दिया सीधा जवाब
जनता के पैसे और समय दोनों का सवाल
आखिरकार संसद की कार्यवाही का खर्च भी देश के खजाने से ही आता है. सांसदों का वेतन, संसद भवन का संचालन, सुरक्षा, कर्मचारियों से लेकर तकनीकी और प्रशासनिक व्यवस्थाओं तक. इन सब पर सार्वजनिक धन खर्च होता है.
ऐसे में 7,023 मिनट का समय बर्बाद होना केवल एक आंकड़ा नहीं है. इसके साथ करोड़ों रुपये के संसदीय संसाधनों का इस्तेमाल भी जुड़ा है. सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं और संसद में सरकार को घेरना भी विपक्ष की जिम्मेदारी है. लेकिन सवाल यह है कि विरोध का ऐसा तरीका क्या हो, जिससे सरकार पर दबाव भी बने और सदन का जरूरी काम भी चलता रहे.
क्योंकि संसद में हंगामा कुछ घंटों के लिए सुर्खियां जरूर बन सकता है, लेकिन अंततः देश की जनता यही जानना चाहती है कि उसके चुने हुए प्रतिनिधियों ने सदन में कितने सवाल पूछे, कितनी गंभीर बहस की और उसके लिए कितना काम किया.
-भारत एक्सप्रेस
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.


