प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर संस्कृत का एक सुभाषित साझा किया. इस श्लोक के जरिए उन्होंने आत्मज्ञान, आंतरिक शक्ति और परम शांति का संदेश दिया है. श्लोक में बताया गया है कि इंसान को वास्तविक शक्ति बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि अपने भीतर छिपे ज्ञान और आत्मबोध से मिलती है. जब व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को समझने लगता है, तो उसके जीवन में आत्मविश्वास और मानसिक शांति का रास्ता खुलता है.
पीएम मोदी ने अपने पोस्ट में संस्कृत का यह श्लोक साझा किया है:
“प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते. आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम्॥”
इसका सरल हिंदी भावार्थ है कि जो व्यक्ति हर अनुभव और चेतना के माध्यम से परम सत्य को पहचान लेता है, वह अमरत्व की प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ता है. आत्मज्ञान से मनुष्य को वास्तविक शक्ति मिलती है और विद्या के माध्यम से वह अज्ञान से बाहर निकलकर परम शांति का अनुभव करता है.
केनोपनिषद से लिया गया है यह संस्कृत श्लोक
प्रधानमंत्री की ओर से साझा किया गया यह श्लोक केनोपनिषद के तृतीय खंड के द्वितीय अध्याय का चौथा मंत्र है. केनोपनिषद सामवेद की एक प्रमुख उपनिषद है, जिसमें ब्रह्म यानी परम सत्य के स्वरूप को समझाने का प्रयास किया गया है. इसमें बताया गया है कि परमात्मा या ब्रह्म को किसी सामान्य वस्तु की तरह इंद्रियों के जरिए नहीं जाना जा सकता.
उपनिषद के अनुसार, ब्रह्म ही वह मूल आधार है, जिसकी वजह से मनुष्य सोचता है, समझता है और किसी चीज का अनुभव कर पाता है. यानी हमारी चेतना के पीछे जो परम तत्व मौजूद है, वही ब्रह्म है. उसे बाहर की दुनिया में खोजने के बजाय अपने भीतर के बोध के जरिए समझने की जरूरत है.
बाहरी नहीं, भीतर की शक्ति है असली ताकत
इस श्लोक का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी है कि धन, पद और भौतिक सुख-सुविधाओं से मिलने वाली ताकत हमेशा के लिए नहीं होती. ये सभी चीजें समय और परिस्थितियों के साथ बदल सकती हैं. लेकिन आत्मज्ञान से मिलने वाली शक्ति व्यक्ति के भीतर स्थायी आत्मविश्वास और समझ पैदा करती है.
जब इंसान खुद को पहचानता है और अपने वास्तविक स्वरूप को समझने की कोशिश करता है, तब वह जीवन की मुश्किल परिस्थितियों को बेहतर तरीके से देख पाता है. उसके भीतर का डर, भ्रम और असमंजस धीरे-धीरे कम होने लगता है. यही आत्मबोध उसे मानसिक स्थिरता की ओर ले जाता है.
अज्ञान से मुक्ति का रास्ता है आत्मज्ञान
केनोपनिषद में अविद्या यानी अज्ञान को मनुष्य के बंधनों और दुखों का एक बड़ा कारण माना गया है. वहीं ब्रह्मविद्या और आत्मज्ञान को इस अज्ञान से मुक्ति पाने का माध्यम बताया गया है. इसका अर्थ है कि केवल किताबी जानकारी हासिल करना ही ज्ञान नहीं है, बल्कि अपने अस्तित्व और चेतना को समझना भी उतना ही जरूरी है.
इस श्लोक के माध्यम से यह समझाया गया है कि परम सत्य को केवल बाहरी दुनिया में तलाशने या पुस्तकों में पढ़ने से पूरी तरह नहीं जाना जा सकता. इसके लिए व्यक्ति को अपने अनुभव, विचार और आंतरिक चेतना को समझना होगा. जब उसे अपने भीतर मौजूद उस परम तत्व का बोध होता है, तब वह अज्ञान और सांसारिक बंधनों से ऊपर उठने की दिशा में आगे बढ़ता है.
-भारत एक्सप्रेस
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