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पीएम मोदी ने शेयर किया ऋग्वेद का यह खास ‘स्वस्ति मंत्र’, जानें क्या है इसका अर्थ और महत्व?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 89वें सूक्त का छठा मंत्र साझा किया गया.

PM Modi

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर ऋग्वेद के एक प्राचीन और प्रसिद्ध मंत्र को साझा किया. यह मंत्र ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 89वें सूक्त का छठा मंत्र है, जिसे आमतौर पर ‘स्वस्ति मंत्र’ या ‘स्वस्तिवाचन’ के रूप में जाना जाता है. शुभ कार्यों, पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों की शुरुआत में इस मंत्र का उच्चारण मंगल और कल्याण की कामना के लिए किया जाता है.

“स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः. स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः. स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः. स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥”

इसका भाव है कि यश और शक्ति के प्रतीक इंद्र हमारा कल्याण करें. संसार के ज्ञान से परिचित और सभी का पालन-पोषण करने वाले पूषा देव हमारे जीवन में मंगल लेकर आएं. गरुड़ स्वरूप तार्क्ष्य हमें संकटों से बचाएं और देवगुरु बृहस्पति हमें शांति, विवेक, सद्बुद्धि और समृद्धि का आशीर्वाद दें.

क्या है इस मंत्र का महत्व?

ऋग्वेद का यह मंत्र केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है. इसमें जीवन से जुड़ी कई बुनियादी इच्छाओं और उम्मीदों की झलक मिलती है—शक्ति मिले, ज्ञान बढ़े, संकटों से सुरक्षा हो और जीवन में सुख-शांति बनी रहे. यही वजह है कि वैदिक परंपरा में इसे शुभ अवसरों पर विशेष महत्व दिया जाता है.

मंत्र में सबसे पहले इंद्रदेव से कल्याण की प्रार्थना की गई है. वैदिक परंपरा में इंद्र को शक्ति, ऊर्जा और पराक्रम से जोड़ा जाता है. इसलिए उनसे ऐसी शक्ति और सामर्थ्य की कामना की जाती है, जो जीवन की मुश्किल परिस्थितियों का सामना करने में मदद करे.

इसके बाद पूषा का उल्लेख आता है. पूषा को सूर्य के एक स्वरूप के तौर पर देखा जाता है और उन्हें पालन-पोषण तथा समृद्धि से जोड़ा गया है. इस संदर्भ में प्रार्थना सिर्फ धन-दौलत की नहीं, बल्कि अन्न, स्वास्थ्य और जीवन की खुशहाली की भी है.

सुरक्षा और सही राह की प्रार्थना

मंत्र में ‘तार्क्ष्य अरिष्टनेमि’ से भी कल्याण की कामना की गई है. ‘अरिष्टनेमि’ का भाव ऐसे रक्षक से जुड़ा है जिसकी सुरक्षा का चक्र कभी कमजोर या बाधित न हो. इसलिए इस हिस्से में जीवन को अलग-अलग तरह के संकटों और बाधाओं से सुरक्षित रखने की प्रार्थना दिखाई देती है.

अंत में देवगुरु बृहस्पति से मंगल, ज्ञान और सद्बुद्धि की कामना की गई है. इसका संदेश आज के संदर्भ में भी काफी सहजता से समझा जा सकता है कि सिर्फ ताकत और संपन्नता ही पर्याप्त नहीं, बल्कि सही और गलत में फर्क करने वाला विवेक भी जरूरी है.

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-भारत एक्सप्रेस



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