रांची (14 अक्टूबर 2026): झारखंड में सरकारी टेंडर जारी होने के बाद भी विकास योजनाओं की प्रगति शून्य या बेहद सुस्त रहने का गंभीर मामला सामने आया है. राज्य की राजधानी रांची में ही लगभग 1400 करोड़ रुपये की लागत वाली सड़क, पुलिया और फ्लाईओवर से जुड़ी कई अहम बुनियादी ढांचागत परियोजनाएं पिछले तीन साल से कागजों और फाइलों में उलझकर रह गई हैं. टेंडर जारी हुए तीन वर्ष से अधिक का समय बीत चुका है, कुछेक योजनाओं पर शुरुआती निर्माण कार्य भी शुरू किया गया, लेकिन बीते तीन सालों से काम पूरी तरह ठप पड़ा हुआ है.
सड़कों और फ्लाईओवरों का काम अधूरा रहने से राजधानी की जनता को आए दिन भीषण ट्रैफिक जाम, धूल और गड्ढों से जूझना पड़ रहा है. ‘भारत एक्सप्रेस’ की ग्राउंड रिपोर्ट में आप वहां का मौजूदा हाल जान सकते हैं-
बीजेपी का तीखा हमला: ‘सिर्फ कमीशन का खेल’
परियोजनाओं के इस तरह लटके रहने पर मुख्य विपक्षी दल बीजेपी ने राज्य सरकार को आड़े हाथों लिया है. झारखंड बीजेपी के मुख्य प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि राज्य में विकास कार्य केवल दिखावे के लिए शुरू किए जाते हैं. उन्होंने कहा कि सरकार को जनता की सुविधाओं और राज्य के विकास से कोई सरोकार नहीं है; सवाल यह उठता है कि क्या केवल कमीशनखोरी का खेल करने के लिए ही टेंडर निकालने की रस्म अदायगी की जा रही है.
कांग्रेस ने दी सफाई: भू-अर्जन और अदालती अड़चनें बाधा
दूसरी तरफ, अमूमन पल्ला झाड़ने वाले मामलों से इतर इस मुद्दे पर सत्ताधारी दल ने भी काम में देरी की बात स्वीकार की है. झारखंड प्रदेश कांग्रेस के मीडिया प्रभारी राकेश सिन्हा ने माना कि योजनाओं के क्रियान्वयन में विलंब हुआ है. हालांकि, उन्होंने इसके लिए भूमि अधिग्रहण (भू-अर्जन) और रैयतों के साथ मुआवजे व रेट को लेकर उपजे विवादों को सबसे बड़ा कारण बताया.
राकेश सिन्हा ने तर्क दिया कि जमीन से जुड़े कई मामले अदालतों में लंबित होने की वजह से काम को गति नहीं मिल सकी. इसके साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार पर असहयोग का आरोप लगाते हुए कहा कि तमाम चुनौतियों और केंद्र से अपेक्षित मदद न मिलने के बावजूद राज्य सरकार अपने बलबूते विकास कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है.

टेंडर के पीछे का खेल और जनता की आंखों में धूल
भले ही रैयतों की नाराजगी और कानूनी पेंच एक बड़ी वजह दिखाई दे रहे हों, लेकिन समस्या की जड़ सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है. प्रशासनिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि टेंडर निकालने और उसे आवंटित करने के पीछे चलने वाले कथित अंदरूनी खेल के कारण भी ठेकेदार काम आगे नहीं बढ़ा रहे हैं.
लगभग 1400 करोड़ रुपये की परियोजनाओं का एक कदम आगे बढ़कर रुक जाना यह साफ दर्शाता है कि सरकार की दिलचस्पी केवल टेंडर निकालने तक सीमित रही, निर्माण को समय पर पूरा कराने में नहीं. जब तक इन योजनाओं का समाधान नहीं निकलता, तब तक रांची की जनता को इन अधूरी परियोजनाओं के दंश से राहत मिलने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं.
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