Justice Suryakant On Rashmirathi
Justice Suryakant On Rashmirathi: राजधानी दिल्ली में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कालजयी कृति ‘रश्मिरथी’ के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर एक भव्य बौद्धिक समागम का आयोजन किया गया. इस खास कार्यक्रम में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत शामिल हुए और ‘रश्मिरथी’ के माध्यम से सामाजिक न्याय के आधुनिक संदर्भों पर विस्तृत विचार रखे. कार्यक्रम की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और पूर्व एडिशनल सॉलिसिटर जनरल विकास सिंह ने की.
हिंदी में बोलने का विशेष अवसर
अपने संबोधन की शुरुआत करते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि संवैधानिक जिम्मेदारियों के 26 वर्षों के दौरान उनका अधिकांश कार्य अंग्रेजी में होता रहा है, जिससे मातृभाषा से भावनात्मक जुड़ाव होने के बावजूद उसका प्रयोग सीमित रह जाता है. ऐसे में यह मंच उनके लिए हिंदी में अपनी बात रखने का विशेष अवसर बना.
साहित्यिक पृष्ठभूमि और दिनकर से जुड़ाव
उन्होंने बताया कि उनका पालन-पोषण एक साहित्यिक वातावरण में हुआ, जहां उनके पिता स्वयं संस्कृत, हिंदी और हरियाणवी के लेखक थे. बचपन से ही उन्हें साहित्य पढ़ने की प्रेरणा मिली, जिसके चलते उन्होंने मुंशी प्रेमचंद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, फणीश्वरनाथ रेणु और विष्णु प्रभाकर जैसे महान साहित्यकारों को पढ़ा और समझा.
रश्मिरथी- सिर्फ काव्य नहीं, सामाजिक न्याय का दस्तावेज
चीफ जस्टिस ने कहा कि ‘रश्मिरथी’ केवल एक महाकाव्य नहीं, बल्कि भारतीय समाज में समानता, सम्मान और मानवीय गरिमा की स्थापना का एक सशक्त दस्तावेज है. उन्होंने कहा कि दिनकर ने कर्ण के चरित्र के माध्यम से उस सामाजिक व्यवस्था पर सवाल उठाया, जहां व्यक्ति का मूल्य उसके कर्म से नहीं बल्कि जन्म से तय किया जाता है.
उन्होंने दिनकर की पंक्तियों का उल्लेख करते हुए सामाजिक असमानता पर तीखा प्रहार किया और कहा कि यह कृति आज भी समाज को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है.
संविधान और रश्मिरथी की प्रासंगिकता
सूर्यकांत ने अपने भाषण में भारतीय संविधान के मूल्यों का जिक्र करते हुए कहा कि अनुच्छेद 14, 15 और 16 समानता, भेदभाव निषेध और अवसर की समानता की गारंटी देते हैं. उन्होंने कहा कि रश्मिरथी में व्यक्त विचार इन संवैधानिक मूल्यों के साथ गहराई से जुड़े हुए हैं.
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि तमाम संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद समाज में आज भी जाति, वर्ग और आर्थिक स्थिति के आधार पर असमानताएं मौजूद हैं. ऐसे में ‘रश्मिरथी’ आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी अपने समय में थी.
कर्ण का चरित्र: संघर्ष, निष्ठा और नैतिक द्वंद्व
उन्होंने कर्ण के जीवन को केवल संघर्ष की कहानी नहीं, बल्कि निष्ठा और नैतिक द्वंद्व का प्रतीक बताया. उन्होंने कहा कि कर्ण ने सामाजिक उपेक्षा के बावजूद अपनी प्रतिभा और स्वाभिमान को बनाए रखा, लेकिन साथ ही अपने मित्र दुर्योधन के प्रति निष्ठा निभाने के कारण जटिल नैतिक परिस्थितियों का सामना किया.
न्याय: अदालतों से आगे की जिम्मेदारी
अपने संबोधन के अंत में चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि न्याय केवल अदालतों के फैसलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज के व्यवहार में भी झलकना चाहिए. उन्होंने कहा कि कानून दिशा देता है, लेकिन वास्तविक न्याय तभी संभव है जब समाज स्वयं समानता, संवेदनशीलता और सम्मान के मूल्यों को अपनाए.
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दिनकर का अतुलनीय योगदान
कार्यक्रम के समापन में वक्ताओं ने रामधारी सिंह दिनकर के साहित्यिक योगदान को याद किया और बताया कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा उन्हें राष्ट्रकवि की उपाधि दी गई थी. रश्मिरथी आज भी सामाजिक न्याय, समानता और मानवीय मूल्यों की प्रेरणा देती है.
-भारत एक्सप्रेस
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