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Explainer: स्कूल में तबेला, नौकरियों का संकट और टूटते सपने…आखिर क्यों बदहाल है भारत की शिक्षा व्यवस्था

India Education System Crisis: आज से 150 साल पहले मैकाले ने जो जहर भारत की शिक्षा व्यवस्था के जड़ों में बोया था, वो अब नासूर बन चुका है. देश भर में कुकुरमुत्ते की तरह कोचिंग संस्थान खुल गए हैं. जहां बच्चों से पढ़ाई के नाम पर मोटी फीस वसूली जाती है और उन्हें सरकारी नौकरी का झांसा दिया जाता है. भारत में कोचिंग इंडस्ट्री हजारों करोड़ों का बाजार बन चुका है.

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क्यों बदहाल है भारत की शिक्षा व्यवस्था?

India Education System Crisis: राजस्थान के जयपुर में मौजूद एक सरकारी स्कूल का CJP प्रवक्ता आशुतोष रांका निरीक्षण करने पहुंचे थे. इस दौरान वहां के ग्रामीणों ने रांका के काफिले पर जमकर ईंट-पत्थर बरसाये. उनकी कारों के कांच तोड़ दिये गए. साथ ही उनके साथ गए कई लोगों को जमकर लातों और ईंटों से पीटा गया.

CJP ने आरोप लगाया है कि उनके साथ इस तरह की मारपीट और पत्थरबाजी राजस्थान सरकार के इशारे पर हुई है. आशुतोष रांका ने कहा है कि राजस्थान सरकार ने अपने गुंडों को भेजकर ये सब कराया है.

बताया जा रहा है कि जयपुर में स्थित इस सरकारी स्कूल में स्थानीय बीजेपी नेता ने तबेला खोल रखा था. इसलिए जब CJP के नेता स्कूल का निरीक्षण करने पहुंचे तो उनके साथ मारपीट की गई. अब सवाल खड़ा होता है कि आखिर भारत की शिक्षा व्यवस्था इतनी चौपट कैसे हो गई कि स्कूलों को तबेला बना दिया गया. सवाल ये भी कि आखिर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत बनाने के सपने पर ऐसा बट्टा कैसे लगाया जा रहा है और वहां के अधिकारी ऐसा होने कैसे दे रहे हैं. इन सभी सवालों के जवाब भारत के शिक्षा व्यवस्था की बुनियाद में छिपा है.

कैसे बहदाहल हुई भारत की शिक्षा व्यवस्था?

यह बात तब की है जब भारत अंग्रेजों का गुलाम हो चुका था. ईस्ट इंडिया कंपनी को पूरे भारत में ऐसे लोग चाहिये थे जो उनके बहीखातों का हिसाब कर सकें. चूकि कोई अंग्रेज इस काम को करता तो उसे ब्रिटिश कानूनों के हिसाब से सैलरी सहित अन्य सुविधाएं देनी पड़ती. इससे बचने के लिए ब्रिटिश हुक्मरानों ने टीबी मैकाले (थोमस बैबिंगटन मैकाले) को भारत में ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनाने के लिए कहा जिससे अंग्रेजों का काम आसान हो जाए. मैकाले ने साल 1835 में भारत में शिक्षा का एक मॉडल बनाया, जिसमें छात्रों को मेधावी नहीं बल्कि रोबोट बनाया जाता था.

मैकाले ने खुद कहा था कि उसे हिंदुस्तान में एक ऐसा वर्ग तैयार करना है जो खून से तो हिंदुस्तानी हो लेकिन अपनी पसंद, विचारों और बुद्धि में पूरी तरह अंग्रेज हो. उसे भारत में सोचने-समझने वाले इंसान की नहीं बल्कि ऐसे क्लर्क चाहिये जो ब्रिटिश राज की गुलामी कर सके. उस दिन को बीते हुए आज लगभग 150 साल हो चुके हैं, लेकिन भारत के उस एजुकेशन सिस्टम में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ. आजादी के बाद भी मैकाले के उस एजुकेशन सिस्टम में सिर्फ इतना बदलाव किया गया कि अब क्लर्क की जगह छात्रों को डिग्रियां थमाई जाती हैं, जो क्लर्क बनने के लिए प्रमुख पात्रता है.

आजादी के बाद सिर्फ बातें हुई काम नहीं

भारत की शिक्षा व्यवस्था की बुनियाद में एलिट वर्ग और अंग्रेजी का जो गारा मैकाले ने डाला था, उसका असर आजादी के बाद भी देखने को मिलता है. जब अंग्रेज भारत को छोड़कर गए तब भारत में साक्षरता दर मात्र 12 प्रतिशत थी. अंग्रेजों ने भारत के गुरुकुल परंपरा से लेकर कारीगर बनने की शिक्षा तक सब बर्बाद कर डाला था. आजादी के बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू भारत के प्रधानमंत्री बने. उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती भारत में शिक्षा का प्रचार-प्रसार था.

उन्होंने देश भर में IIT और IIM जैसे उच्च शिक्षा के संस्थान तो खड़ा किये, लेकिन जो सबसे महत्वपूर्ण चीज थी उसपर जितना ध्यान देना चाहिये था, वो नहीं दिया गया. और वो चीज थी प्रथमिक शिक्षा. भारत में प्राथमिक शिक्षा के लिए जरूरी स्कूलों के इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर शिक्षकों तक की भारी कमी थी. हालांकि तब अधिकतर छात्र चाहे वो उच्च जातियों के हों या नीची जातियों के, सभी एक साथ टाट पर बैठकर पढ़ते थे. इसका असर भारत की शिक्षा व्यवस्था पर भी देखने को मिला. उस समय वैज्ञानिकों से लेकर बड़े अधिकारियों तक अधिकतर लोग उसी टाट पर बैठकर पढ़ने वाले पीढ़ी से थे.

देश में शिक्षा व्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए साल 1964 में एक बड़ा निर्णय लिया गया. तब के मशहूर वैज्ञानिक डॉ. दौलत सिंह कोठारी को यह जिम्मेदारी दी गई कि देश में ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनाई जाए जो भारत की तरक्की में नई दिशा दे. इस आयोग को कोठारी कमीशन कहा जाता है. तब डॉक्टर कोठारी ने दुनिया भर के बड़े और मशहूर शिक्षाविदों और समाजशास्त्र के जानकारों को साथ लेकर पूरे देश में रिसर्च किया. दो सालों तक कड़ी मेहनत के बाद तैयार रिपोर्ट साल 1966 में सरकार को सौंप दी गई. इस रिपोर्ट को जब खोला गया तब इसके पहले ही पेज पर लिखा था कि भारत का भविष्य निर्माण उसके क्लासरूम में हो रहा है. उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कॉमन स्कूल सिस्टम का कॉनसेप्ट दिया. इसके अलावा उन्होंने नेबरहुड स्कूल का भी विचार दिया, जिसमें बताया गया था कि हर 3 से 5 किलोमीटर के अंदर एक शानदार सरकारी स्कूल बनाया जाए. जहां आसपास के गांवों के बच्चे आकर पढ़ सकें. इन स्कूल्स में ना जाति देखी जाती हो और ना ही हैसियत. इसका सीधा सा अर्थ था कि इन स्कूलों में अधिकारियों से लेकर बड़े जमिंदारों और नेताओं तक के बच्चे, गरीब और पिछड़े इलाकों से आने वाले बच्चों के साथ पढ़ सकें.

डॉ. कोठारी का मानना था कि भारत के समाज में बहुत विरोधाभास है. ऐसे में सभी तक शिक्षा पहुंचे इसके लिए जरूरी है कि बड़े जमिंदारों से लेकर अधिकारियों और नेताओं के बच्चे भी उन्हीं स्कूल्स में पढ़ें जहां गरीबों और मजदूरों के बच्चे पढ़ते थे. उनका सोचना था कि अगर एक ही स्कूल में बड़े लोगों के बच्चे गरीब बच्चों के साथ पढ़ेंगे तो पढ़ाई भी अच्छी होगी और कोई लापरवाही भी नहीं बरती जा सकेगी. लेकिन जब यह रिपोर्ट लागू करने की बात हुई तब संसद में मौजूद सांसदों की सांसें थम गईं. उनके अंदर मैकाले का वहीं भूत जिंदा हो गया जिसने कहा था कि उन्हें सोचने समझने वाले छात्र नहीं बल्कि हां-जी करने वाला गुलाम चाहिये. इस तरह से जो कमिशन भारत की शिक्षा व्यवस्था की दशा और दिशा बदल सकता था वो नेताओं के टेबल पर धूल फांकने लगा. जिस कोठारी कमिशन में कहा गया था कि देश अपनी GDP का कम से कम 6 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा पर खर्च करे, वो कभी 2-4% के आगे बढ़ ही नहीं सका.

प्राइवेट स्कूलों ने तोड़ दी लोगों की कमर

धीरे-धीरे भारत में बड़े प्राइवेट स्कूल खुलने शुरू हो गए. अब बड़े नेताओं से लेकर अधिकारियों और जमिंदारों के बच्चे उन प्राइवेट स्कूलों में जाने लगे. इन स्कूलों की भारी-भरकम फीस ने आम लोगों की पहुंच से इन्हें बाहर कर दिया. साल 1970 आते-आते देश में कई प्राइवेट स्कूल खुले, जिसमें अंग्रेजी मीडियम में पढ़ाई होती थी. यहां एडमिशन लेने का मतलब आपके पास उच्च पदों पर जाने का ज्यादा मौका था. वहीं सरकारी स्कूलों को उनकी हाल पर छोड़ दिया गया. समय के साथ इन स्कूलों का बजट भी कम किया जाने लगा.

अचानक से इन स्कूलों से निकलकर बड़े अधिकारियों और नेताओं के बच्चे प्राइवेट स्कूलों में चले गए. जिसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों ने भुगता. नेता और अधिकारी स्कूलों की व्यवस्था, उसके रखरखाव पर ध्यान देना छोड़ दिये. जिसकी वजह से इन स्कूलों में सिर्फ किसानों, गरीबों और मजदूरों के बच्चे ही बचे, जिनका सुध लेने वाला कोई नहीं था.

साल 1990 में प्राइवेटाइजेशन आने के बाद तो हालत और बुरी हो गई. देश में मिडिल क्लास बढ़ने लगा. गांवों के जो अमीर लोग थे वो भी अपने बच्चों को इन स्कूलों से निकालकर प्राइवेट स्कूलों में दाखिला कराने लगे. इसका असर ये पड़ा कि अब सरकारी स्कूलों में सिर्फ दलित और गरीब-मजदूरों के बच्चे ही पढ़ने लगे. अधिकारी और नेताओं की आंखों से ये स्कूल हमेशा के लिए ओझल हो गए.

कुकुरमुत्ते की तरह खुल गए हैं कोचिंग संस्थान

आज इसी का परिणाम है कि देश भर में कुकुरमुत्ते की तरह कोचिंग संस्थान खुल गए हैं. जहां बच्चों से पढ़ाई के नाम पर मोटी फीस वसूली जाती है और उन्हें सरकारी नौकरी का झांसा दिया जाता है. भारत में कोचिंग इंडस्ट्री हजारों करोड़ों का बाजार बन चुका है. हालत ये है कि ये कोचिंग संस्थान अब सरकारों तक को प्रभावित करने लगे हैं.

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आज से 150 साल पहले मैकाले ने जो जहर भारत की शिक्षा व्यवस्था के जड़ों में बोया था, वो अब नासूर बन चुका है. इसी का परिणाम है कि आज भारत में आए दिन पेपर लीक होते हैं और गरीब घरों के बच्चे धरना-प्रदर्शन करने को मजबूर हैं.

-भारत एक्सप्रेस



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