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यूनिटेक के पीड़ितों की उम्मीद और पैसों पर पानी फेर रहे हैं रिटायर्ड IAS युद्धवीर सिंह मलिक !

यूनिटेक लिमिटेड की कुर्सी पर बैठने के बाद युद्धवीर सिंह ने एक ऐसा विवादित प्रस्ताव पारित करा लिया, जिसके अनुसार किसी भी घर खरीददार को कोई मुआवजा, देरी पर जुर्माना, निवेश की गई राशि पर ब्याज नहीं मिलेगा.

अपने कामकाज और विवादित फैसलों के कारण सरकार के लिए अक्सर परेशानी खड़ी करने वाले सेवानिवृत्त आईएएस युद्धवीर सिंह मलिक अब यूनिटेक की परियोजनाओं में घर खरीदने का सपना संजोए निवेशकों के लिए भी परेशानी बन गए हैं. हैरानी की बात तो यह है कि जिस सुप्रीम कोर्ट ने साढ़े पांच साल पहले उन्हें घर खरीददारों के हितों की रक्षा के लिए नियुक्त किया था, उन्होने अदालत की उस मंशा के विपरीत ही प्रस्ताव पारित कर दिए. आरोप है कि कंपनी के पैसे से लुटियन ज़ोन के आलीशान आशियाने में रहने के लिए के बदले करोड़ों रुपए खर्च कर चुके मलिक तथाकथित तौर पर कंपनी की मार्किट वैल्यू कमतर कराने की चेष्टा कर रहे हैं.

यह था पूरा मामला

वित्त वर्ष 2019 की ऑडिटे रिपोर्ट पर नजर डालें तो कंपनी की 185 घरेलू सहयोगी कंपनियाँ और 32 विदेशी सहयोगी कंपनियां थी. साथ ही 21 सहयोगी या संयुक्त उपक्रम थे. नवंबर 2019 में, कंपनी ने एलिस डेवेलपर्स प्राइवेट लिमिटेड में अपने पास मौजूद कुछ परिवर्तनीय डिबेंचर्स को शेयरों में परिवर्तित कराने का विकल्प अपनाया, जिससे उस इकाई में यूनिटेक की हिस्सेदारी बढ़कर 52% हो गई. जिससे कम्पनी की कुल सहायक कंपनियों की संख्या बढ़कर 186 हो गई.

कंपनी 78 आवासीय परियोजनाओं और 13 कॉमर्शियल प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही थी. इनमे 49 निर्माणाधीन परियोजनाएं थी, जिनमें काफी मात्रा में निर्माण शेष था और और 14,834 इकाइयों की डिलीवरी ग्राहकों को की जानी बाकी थी. शेष में से 24 पूर्ण हो चुकी परियोजनाओं में कई अधूरे कामों के कारण 146 इकाइयों की डिलीवरी नहीं की गई थी. जबकि 05 ऐसी परियोजनाएं थी, जिनमें ग्राहकों की संख्या बहुत कम थी या कोई ग्राहक नहीं था. इसके साथ ही कंपनी की 04 आवासीय और 07 वाणिज्यिक परियोजनाएं जॉइंट वेंचर के तहत भोपाल, देहरादून, मुंबई, नोएडा और नई दिल्ली में भी चल रही थी.

सर्वोच्च अदालत का जनहितकारी फैसला

मामला अपने समक्ष पहुंचने के बाद इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने 20 जनवरी 2020 के आदेश के माध्यम से, कंपनी का प्रबंधन अपने नियंत्रण में लेने के लिए कंपनी के बोर्ड निदेशकों की नियुक्ति संबंधी केंद्र सरकार के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया. इसके तहत सेवानिवृत्त IAS युधवीर सिंह मलिक को कंपनी का अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक नियुक्त कर दिया गया. इसके साथ ही रेनू सुद कर्नाड, जीतू वीरवानी, निरंजन हीरानंदानी, डॉ. गिरीश कुमार आहूजा और बी. श्रीराम को निदेशक नियुक्त कर दिया गया. आरोप है कि मलिक की मनमानी से परेशान होकर इनमे से कई बड़े चेहरों ने बोर्ड से दूरी बना ली.

अदालत की कोशिश पर पानी फेरने की कोशिश !

कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट तौर पर चिंता जताते हुए लिखा की “उसके समक्ष सबसे महत्वपूर्ण चिंता यह रही है कि घर खरीदारों के हितों की रक्षा की जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि उन्होंने वर्षों से जो धन निवेश किया है, उसका परिणाम यह हो कि निकट भविष्य में उन्हें वह आवासीय इकाइयाँ मिलें, जिनकी बिक्री का उनसे वादा किया गया था.”

यूनिटेक लिमिटेड की कुर्सी पर बैठने के बाद युद्धवीर सिंह ने एक ऐसा विवादित प्रस्ताव पारित करा लिया, जिसके अनुसार किसी भी घर खरीददार को कोई मुआवजा, देरी पर जुर्माना, निवेश की गई राशि पर ब्याज नहीं मिलेगा. इतना ही इस सम्बन्ध में कोई भी आदेश, डिक्री या आवंटन आदि का आदेश भी ऐसा नहीं कर पाएगा.

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि युद्धवीर सिंह मलिक को अदालत ने घर खरीददारों के हितों की रक्षा के लिए नियुक्त किया था या उनके हक को कुचलने के लिए ?

मलिक पर लग रहे हैं आरोप

विडंबना है कि युद्धवीर सिंह मलिक साढ़े पांच साल के कार्यकाल में किसी को भी रहत देने में विफल साबित हुए हैं. इतना ही नहीं अब उन पर गंभीर आरोप भी लगने लगे हैं. खरीदारों का आरोप है कि वह सर्वोच्च न्यायालय के नाम पर खरीददारों को प्रताड़ित ही नहीं कर रहे हैं, मनमानी भी कर रहे हैं. उन पर आरोप है कि उन्होंने नोएडा अथोरिटी से ही विवाद शुरू नहीं किया, बल्कि अदालती विवादों की संख्या में भी बढ़ोत्तरी करा दी है.

अब तो यह आरोप भी लगने लगे हैं कि युद्धवीर सिंह मलिक की मनमानी खरीददारों की उम्मीद पर पानी फेरने का काम कर रही है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार युद्धवीर सिंह मलिक के नेतृत्व में पारित रेजोलुशन प्लान में नोएडा की जिस भूमि की कीमत 5641 करोड़ रुपए आंकी गई है, वास्तव में बाजार मूल्य के अनुरूप उस भूमि की कीमत करीब 40 हजार करोड़ रुपए बताई जा रही है.

हरियाणा सरकार को करोड़ों का नुकसान कराने का भी लगा था आरोप

2014 में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को भी उनके खिलाफ एक शिकायत मिली थी. जिसमें आरोप लगाया गया कि के हरियाणा राज्य औद्योगिक एवं बुनियादी ढांचा विकास निगम (HSIIDC) में कार्यकाल के दौरान गुड़गांव में जमीन डीएलएफ (DLF) को बाजार मूल्य से कहीं कम कीमत पर बेची गई. नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ऑडिट रिपोर्ट में भी इन सौदों से राज्य को लगभग ₹438.91 करोड़ के संभावित नुकसान की बात सामने आई थी.

पहले भी विवादित फैसले से कराई थी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर किरकिरी!

भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण के सीईओ के पद पर काम करते हुए युधवीर सिंह मलिक ने जून 2015 में पूरे देश में नेस्ले की मैगी नूडल्स पर प्रतिबंध लगा दिया था. उनके नेतृत्व में किए गए परीक्षणों के आधार पर दावा किया गया था कि मैगी में निर्धारित मानकों से अधिक सीसा (lead) और मोनोसोडियम ग्लूटामेट (MSG) पाया गया है. यही वजह बताई जा रही है की उन्हें केवल एक साल के भीतर प्राधिकरण से हटा दिया गया, जबकि इनका कार्यकम तीन साल का था. लेकिन उनके निर्णय के कारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ही देश की किरकिरी नहीं हुई, बॉम्बे उच्च न्यायालय ने भी देशव्यापी प्रतिबंध को “मनमाना” और “प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन” बताते हुए खारिज कर दिया था. यही वजह रही कि महज छह माह से भी कम समय में मैगी फिर बाजार में उतर गई.

 उत्तराखंड सरकार को धमकाने का भी लग चुका है आरोप

इसके अलावा उन पर उत्तराखंड सरकार को धमकाने के आरोपों ने तो राजनितिक हलकों में सनसनी मचा दी थी. दरअसल जिस समय मलिक NHAI के चैयरमैन के तौर पर काम कर रहे थे, तब आरोप लगे थे कि एनएच‑74 (फर्रुखाबाद–रुद्रपुर/उधम सिंह नगर) के लिए हुए अधिग्रहण वाली जमीन को अचानक गैर‑कृषि घोषित कर दिया गया था. जिससे जमीन मालिकों को सामान्य से 8–10 गुना अधिक मुआवजा दिया गया.

मामले में NHAI के स्थानीय अधिकारियों पर भी शामिल होने का आरोप लगा था. जिसके बाद मार्च 2017 में देहरादून के पंतनगर पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज हुई और इसमें जिसमें राजस्व अधिकारी के साथ NHAI के क्षेत्रीय अधिकारी भी आरोपी बनाए गए थे. इसके बाद युधवीर सिंह मलिक ने 26 मई 2017 को उत्तराखंड के मुख्य सचिव को पत्र लिखा और NHAI अधिकारियों का नाम FIR से हटाने का आग्रह किया. इतना ही नहीं यह धमकी थी दी कि यदि राज्य सरकार ने ऐसा नहीं किया तो तो NHAI अपनी  परियोजनाओं को रोक सकती है. इसके बाद आरोपी NHAI अधिकारियों  PC आर्य, नरेंद्र कुमार और अजय बिश्नोई आदि ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय में FIR रद्द कराने की याचिका डाली, लेकिन अनुरोध स्वीकार नहीं हुआ.


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-भारत एक्सप्रेस



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