School van safety rules
School van safety rules: बिहार के औरंगाबाद जिले में बच्चों से भरी एक स्कूल वैन के नहर में गिरने से 15 बच्चे घायल हो गए, जिनमें तीन की हालत गंभीर है. यह कोई पहला मामला नहीं है. देश के अलग-अलग राज्यों में समय-समय पर स्कूल वाहनों से जुड़े हादसे सामने आते रहे हैं. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर बार-बार होने वाले इन हादसों के पीछे वजह क्या है और बच्चों की सुरक्षा के लिए बने नियमों का कितना पालन हो रहा है?
स्कूल वाहनों के नियम
स्कूल वाहनों की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और राज्यों के परिवहन विभागों की गाइडलाइन में कई स्पष्ट नियम तय किए गए हैं. स्कूल बस या वैन के पास वैध फिटनेस सर्टिफिकेट, परमिट, बीमा और प्रदूषण प्रमाणपत्र होना अनिवार्य है. वाहन में स्पीड गवर्नर लगा होना चाहिए, ताकि उसकी रफ्तार निर्धारित सीमा से अधिक न हो सके. साथ ही जीपीएस ट्रैकिंग सिस्टम और फर्स्ट एड बॉक्स जैसी सुविधाएं भी जरूरी मानी गई हैं.
कितने बच्चों को बैठाने की होती हैअनुमति
नियमों के अनुसार, वाहन में उतने ही बच्चों को बैठाया जा सकता है जितनी उसकी पंजीकृत सीट क्षमता है. कई राज्यों में छोटे बच्चों के लिए सीमित अतिरिक्त सीटिंग की अनुमति स्थानीय नियमों के अनुसार दी जा सकती है, लेकिन क्षमता से अधिक बच्चों को ठूंसकर बैठाना पूरी तरह असुरक्षित माना जाता है. इसके बावजूद कई निजी स्कूलों में एक ही वैन में जरूरत से ज्यादा बच्चों को बैठाने की शिकायतें लगातार सामने आती रहती हैं.
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फिटनेस सर्टिफिकेट, GPS, महिला अटेंडेंट, स्पीड गवर्नर जैसे नियम
सुरक्षा व्यवस्था का एक और अहम हिस्सा प्रशिक्षित चालक और सहायक स्टाफ है. स्कूल वाहन चालक के पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस और पर्याप्त अनुभव होना चाहिए. छोटे बच्चों के साथ एक महिला अटेंडेंट होनी चाहिए. ताकि चढ़ने-उतरने के दौरान बच्चों को किसी प्रकार की दिक्कत ना हो. अधिकतर हादसों के पीछे ओवरलोडिंग, वाहनों की खराब तकनीकी स्थिति, नियमित फिटनेस जांच में लापरवाही, तेज रफ्तार और चालक की असावधानी प्रमुख कारण होते हैं. कई मामलों में निजी स्कूल परिवहन का संचालन निजी ठेकेदारों के भरोसे छोड़ देते हैं, जहां सुरक्षा मानकों की अनदेखी की जाती है.
औरंगाबाद का हादसा एक बार फिर यह याद दिलाता है कि केवल नियम बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका सख्ती से पालन और नियमित निगरानी भी उतनी ही जरूरी है. यदि स्कूल प्रबंधन, परिवहन विभाग और अभिभावक अपनी-अपनी जिम्मेदारियां गंभीरता से निभाएं, तो ऐसे कई हादसों को रोका जा सकता है और बच्चों का सफर पहले से कहीं अधिक सुरक्षित बनाया जा सकता है.
भारत एक्सप्रेस
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