40 साल बाद आसमान में फिर दिखा भारतीय जांबाज का पराक्रम
Captain Smit Machchhar: 34 हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ रहा विमान. कॉकपिट के भीतर चाकू से हमला होता है और मुख्य पायलट गंभीर रूप से घायल हो जाता है. विमान तेजी से नीचे जा रहा था और उसमें सवार 174 यात्रियों को अंदाजा तक नहीं था कि कुछ सेकंड बाद क्या होने वाला है. लेकिन इसी अफरातफरी के बीच एक भारतीय पायलट ने हार मानने से इनकार कर दिया.
फ्लाईदुबई की उड़ान FZ1073 में जो हुआ, उसने कई लोगों को 1986 की उस घटना की याद दिला दी, जब एक भारतीय महिला ने सैकड़ों यात्रियों की जान बचाने के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी थी. तब नाम था नीरजा भनोट. आज चर्चा कैप्टन स्मित मछार की है.
जब कॉकपिट बन गया जंग का मैदान
30 सितंबर 2026 को फ्लाईदुबई की फ्लाइट दुबई से तेल अवीव के लिए रवाना हुई थी. उड़ान सामान्य थी, लेकिन बीच आसमान में अचानक सब कुछ बदल गया.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ओमानी को-पायलट ने कैप्टन स्मित मछार पर चाकू से हमला कर दिया. हमले में स्मित गंभीर रूप से घायल हो गए. इसी दौरान विमान तेजी से ऊंचाई खोने लगा और कुछ ही पलों में करीब 14 हजार फीट नीचे आ गया. एक तरफ घायल पायलट, दूसरी तरफ हमलावर और तीसरी तरफ सैकड़ों जिंदगियां. हालात ऐसे थे कि छोटी सी चूक भी बड़ा हादसा बन सकती थी. लेकिन स्मित पीछे नहीं हटे.
बताया जा रहा है कि उन्होंने हमलावर का मुकाबला किया और किसी तरह कॉकपिट का दरवाजा खुलवाने में कामयाब रहे. इसके बाद केबिन क्रू और कुछ यात्रियों ने अंदर पहुंचकर हमलावर को काबू किया. बाद में विमान को सुरक्षित रूप से सऊदी अरब के तबुक एयरपोर्ट पर उतारा गया.
40 साल पहले भी एक भारतीय ने बचाई थीं सैकड़ों जानें
स्मित मछार की यह कहानी सुनकर लोगों को नीरजा भनोट याद आ गईं. 5 सितंबर 1986 को पैन एम फ्लाइट-73 कराची एयरपोर्ट पर खड़ी थी, तभी चार हथियारबंद आतंकियों ने विमान को हाईजैक कर लिया. विमान में मौजूद नीरजा भनोट उस उड़ान की सीनियर फ्लाइट अटेंडेंट थीं.
जैसे ही उन्हें खतरे का अंदेशा हुआ, उन्होंने तुरंत कॉकपिट क्रू को अलर्ट कर दिया. पायलट विमान से निकलने में सफल रहे और आतंकी विमान को उड़ाकर कहीं और नहीं ले जा सके. लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी.
17 घंटे तक मौत के साए में खड़ी रहीं नीरजा
करीब 17 घंटे तक विमान आतंकियों के कब्जे में रहा. नीरजा लगातार यात्रियों को संभालती रहीं. जब आतंकियों ने अमेरिकी यात्रियों की पहचान के लिए पासपोर्ट मांगे, तब नीरजा और उनके साथियों ने कई पासपोर्ट छिपा दिए ताकि यात्रियों की जान बच सके. फिर वह पल आया, जब आतंकियों ने गोलीबारी शुरू कर दी.
अराजकता के बीच नीरजा ने इमरजेंसी एग्जिट खोल दिया और यात्रियों को बाहर निकालना शुरू किया. वह चाहतीं तो खुद सबसे पहले निकल सकती थीं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. रिपोर्ट्स के अनुसार, तीन बच्चों को बचाने की कोशिश में वह आतंकियों की गोलियों का शिकार हो गईं.
दो कहानियां, एक जज्बा
इन दोनों घटनाओं के बीच 40 साल का फासला है. एक कहानी में कॉकपिट के अंदर चाकू से हमला झेलता भारतीय पायलट है. दूसरी कहानी में आतंकियों से घिरे विमान में खड़ी एक भारतीय एयर होस्टेस.
खतरे अलग थे, हालात अलग थे, लेकिन दोनों कहानियों में एक समानता साफ दिखाई देती है – जब सैकड़ों लोगों की जान दांव पर लगी, तब इन भारतीयों ने सबसे पहले यात्रियों की सुरक्षा को चुना.
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नीरजा भनोट ने 1986 में अपनी जान देकर सैकड़ों लोगों को बचाया था. चार दशक बाद, कैप्टन स्मित मछार ने गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद एक बेकाबू होते विमान को सुरक्षित जमीन तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई. यही वजह है कि उनकी बहादुरी की चर्चा अब दुनिया भर में हो रही है.
-भारत एक्सप्रेस
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