भारतीय राजनीति और विधि जगत की एक प्रमुख शख्सियत, पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के पति और भाजपा सांसद बांसुरी स्वराज के पिता स्वराज कौशल का आज निधन हो गया. मात्र 73 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली. लंबे समय से बीमार चल रहे स्वराज कौशल न केवल एक वरिष्ठ वकील थे, बल्कि देश के सबसे युवा राज्यपालों में से एक के रूप में भी याद किए जाते हैं. उनकी जिंदगी संघर्ष, उपलब्धियों और शांति स्थापना की मिसाल रही. खासकर मिजोरम शांति समझौते में उनकी भूमिका ने पूर्वोत्तर भारत के इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया.
स्वराज कौशल का प्रारंभिक जीवन
स्वराज कौशल का जन्म 12 जुलाई 1952 को हुआ था. वे एक मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते थे, जहां शिक्षा और नैतिक मूल्यों को सर्वोच्च महत्व दिया जाता था. उन्होंने अपनी कानूनी शिक्षा पूरी करने के बाद दिल्ली में वकालत शुरू की. मात्र 34 वर्ष की उम्र में वे मिजोरम के महाधिवक्ता बने, जो उस समय एक रिकॉर्ड था. इसके बाद, 1986 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा प्रदान किया. उनकी बुद्धिमत्ता और कूटनीतिक कौशल ने जल्द ही उन्हें राजनीतिक पटल पर स्थापित कर दिया.
स्वराज कौशल की शादी सुषमा स्वराज से आपातकाल के दौर में हुई थी. यह जोड़ी भारतीय राजनीति की सबसे चर्चित और प्रेरणादायक दंपतियों में से एक बनी. सुषमा स्वराज के निधन (2019) के बाद बेटी बांसुरी को राजनीति में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया.
सबसे युवा राज्यपाल
1990 में, स्वराज कौशल ने मात्र 37 वर्ष की आयु में मिजोरम के राज्यपाल के रूप में शपथ ली. यह उपलब्धि उन्हें भारत के सबसे कम उम्र के राज्यपालों की सूची में शुमार कराती है. उस समय मिजोरम लंबे समय से उग्रवाद की आग में जल रहा था. मिजो नेशनल फ्रंट (MNF) के नेतृत्व में चले आ रहे विद्रोह ने राज्य को अस्थिर कर दिया था. स्वराज कौशल का आगमन इस संकट के बीच हुआ, और उन्होंने अपनी कूटनीतिक चतुराई से स्थिति को संभालने का बीड़ा उठाया.
मिजोरम शांति समझौते में ऐतिहासिक भूमिका
मिजोरम शांति समझौता (Mizo Accord, 1986) पूर्वोत्तर भारत के इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय है. हालांकि समझौता 1986 में हुआ, स्वराज कौशल ने राज्यपाल के रूप में इसकी कार्यान्वयन और स्थायी शांति सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. विद्रोही नेता लालदेंगा (बाद में मुख्यमंत्री लाल थलंगलीना) के साथ संवाद प्रक्रिया को मजबूत करने में उन्होंने अहम योगदान दिया. 20 वर्षों से चली आ रही उग्रवाद समस्या को समाप्त करने वाले इस समझौते ने मिजोरम को विकास के पथ पर अग्रसर किया.
स्वराज कौशल ने न केवल राजनीतिक वार्ताओं को बढ़ावा दिया, बल्कि स्थानीय समुदायों के बीच विश्वास बहाली के लिए भी प्रयास किए. उनकी यह भूमिका मिजोरम insurgency को समाप्त करने में निर्णायक साबित हुई. लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी सुषमा स्वराज दंपति की कई उपलब्धियां दर्ज हैं, जिनमें स्वराज कौशल की युवावस्था में हासिल की गई ऊंचाइयां शामिल हैं.
उपलब्धियां और विधि जगत में योगदान
मिजोरम से लौटने के बाद स्वराज कौशल हरियाणा से राज्यसभा सांसद चुने गए (1998-2004). उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में कई हाई-प्रोफाइल मामलों की पैरवी की, जिसमें पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस का बचाव भी शामिल था. उनकी वकालत शैली तर्कसंगत और प्रभावशाली मानी जाती थी. राजनीति से दूर रहते हुए भी उन्होंने सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभाई.
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-भारत एक्सप्रेस
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