यूपी की राजनीति में दलबदल का खेल कितना अहम?
UP Politics Defection: उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनाव से पहले नेताओं का दल बदलना कोई नई बात नहीं है. जैसे ही चुनाव नजदीक आते हैं, कई नेता अपने फायदे के लिए पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी का दामन थाम लेते हैं. राजनीतिक दल भी सामाजिक समीकरणों को साधने के लिए ऐसे नेताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करते हैं. हाल ही में सैयद आसिम वकार ने AIMIM छोड़कर कांग्रेस का रुख किया है. सवाल यही है कि ऐसे दलबदलू नेता चुनावी जीत में कितने कारगर साबित होते हैं.
2022 का अनुभव
पिछले विधानसभा चुनाव में भी दलबदलू नेताओं की खूब चर्चा रही. रिपोर्ट्स के मुताबिक 2022 में 206 उम्मीदवार ऐसे थे जिन्होंने अलग-अलग पार्टियों से चुनाव लड़ा. यह संख्या 1977 के बाद सबसे कम थी. लेकिन इनमें से हर पांच में से सिर्फ एक ही जीत सका. यानी पार्टी बदलना अपने आप में जीत की गारंटी नहीं है.
बड़े नामों की हार और जीत
2022 में योगी सरकार के मंत्री रहे स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान और धर्म सिंह सैनी ने बीजेपी छोड़कर समाजवादी पार्टी का दामन थामा. लेकिन मौर्य और सैनी चुनाव हार गए. चौहान जीत तो गए, लेकिन बाद में इस्तीफा देकर फिर बीजेपी में लौट आए. कांग्रेस छोड़कर सपा में आए इमरान मसूद को टिकट ही नहीं मिला. इन घटनाओं ने साफ कर दिया कि केवल पार्टी बदलने से वोट ट्रांसफर नहीं होता.
पुराने चुनावों में असर
हालांकि, 2022 के नतीजों से ही दलबदलू नेताओं की ताकत को आंकना सही नहीं होगा. 2007, 2012 और 2017 के चुनावों में कई बार ऐसे उम्मीदवारों ने बड़ी भूमिका निभाई. 2017 में बीजेपी ने 65 दलबदलुओं को टिकट दिया, जिनमें से 52 जीत गए. वहीं SP और BSP के दलबदलू उम्मीदवारों की सफलता दर बेहद कम रही. 2012 में SP ने 32 दलबदलुओं को टिकट दिया और 14 जीत गए. 2007 में BSP के 44 दलबदलुओं में से 27 विजयी रहे.
दलबदलुओं की सफलता दर
दलबदलू नेता की ताकत सिर्फ उसके व्यक्तिगत प्रभाव से तय नहीं होती. यह ज्यादा मायने रखता है कि वह किस राजनीतिक लहर के साथ खड़ा है. जिस पार्टी की जीत की संभावना मजबूत होती है, उसके टिकट पर लड़ने वाले दलबदलुओं की सफलता दर भी बढ़ जाती है.
वोट बैंक और समीकरण
किसी नेता के पास अपना व्यक्तिगत वोट बैंक हो सकता है, लेकिन चुनाव केवल व्यक्ति के आधार पर नहीं जीते जाते. पार्टी का संगठन, नेतृत्व, जातीय समीकरण और सरकार का प्रदर्शन भी अहम होता है. यही वजह है कि 2022 में बड़े नेताओं के दलबदल का बीजेपी पर खास असर नहीं पड़ा. पार्टी ने अपनी पिछली सीटें लगभग बरकरार रखीं.
पार्टियों को कैसे फायदा?
दलबदलू नेता पार्टी को किसी खास जाति, इलाके या सामाजिक समूह में पकड़ बनाने में मदद कर सकते हैं. यही कारण है कि पार्टियां ऐसे नेताओं को टिकट देकर सीट का समीकरण बदलने की कोशिश करती हैं.
2027 की तैयारी
अब जब 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं, तो फिर से कई नेताओं के पाला बदलने की चर्चा तेज है. 2024 लोकसभा चुनाव के बाद यूपी का राजनीतिक माहौल बदला है. ऐसे में OBC, दलित और क्षेत्रीय प्रभाव वाले नेताओं की अहमियत और बढ़ सकती है.
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-भारत एक्सप्रेस
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