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वाराणसी महामूर्ख सम्मेलन: यहां होता है देशभर के हास्य कवियों का जमावड़ा, ठहाकों से गूंजते रहते हैं बनारस के घाट

बनारस का रंग निराला है, यहां हर त्योहार और परंपरा में एक अनोखा अंदाज देखने को मिलता है. ऐसा ही एक अलग अंदाज हर साल 1 अप्रैल को देखने को मिलता है, जब वाराणसी के घाट पर महामूर्ख सम्मेलन का आयोजन किया जाता है.

Mahamurkh sammelan 2025

Mahamurkh Sammelan 2025: दुनिया की सबसे अनोखी नगरी काशी की परंपराएं जितनी अनोखी है उतना ही यहां अनोखा अंदाज देखने को मिलता है, जब वाराणसी के राजेंद्र प्रसाद घाट पर महामूर्ख सम्मेलन का आयोजन किया जाता है. हर साल की तरह इस साल भी काशी में अप्रैल महीने की पहली तारखी को 57वें महामूर्ख सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें हास्य और व्यंग्य की महफिल देर रात तक सजी रही. देशभर से आए कवियों ने अपन हास्य-व्यंग्य रचनाओं से दर्शकों को खूब हंसाया और ठहकों की गूंज देर रात तक घाट पर गूंजती रही.

हजारों की संख्या में शामिल हुए लोग

वाराणसी के इस खास आयोजन में राजेंद्र प्रसाद घाट पर हजारों की संख्या में लोग शामिल हुए. कार्यक्रम में बनारस सहित देश के अन्य राज्यों से भी हास्य कवि पहुंचे जिन्होंने अपने रचनाओं से ऐसा समा बांधा कि वहां उपस्थित लोगों को हंसा-हंसा कर लोटपोट कर दिया. लोगों ने मूर्खता को खुले दिल से अपनाते हुए सालभर की सारी चिंताओं को एक रात के लिए छोड़ दिया.

दमदार बनारसी ने हंसी-मजाक से भर दिया पूरा माहौल

कवि सम्मेलन का संचालन दमदार बनारसी ने किया और उन्होंने पूरे माहौल को हंसी-मजाक से भर दिया. इस कार्यक्रम में कवि अखिलेश द्विवेदी, सौरभ जैन सुमन, बिहारी लाल अंबर, सुदीप भोला, बादशाह प्रेमी संजय सिंह, श्याम लाल यादव, महेश चंद्र जायसवाल और डॉ. प्रशांत सिंह ने अपनी कविताएं प्रस्तुत कीं.

कवि विनोद पाल ने खास अंदाज में पेश की कविताएं

दिल्ली से आए कवि विनोद पाल ने अपने खास अंदाज में कहा-खुद अपने चरित्र पर ही मूंग दल रहे हो तुम, अच्छे हो तो क्यों फितरत बदल रहे हो तुम, अगर लड़की तुम्हें देख के रास्ता बदल रही है तो ये जान लो गलत रास्ते पे चल रहे हो तुम.

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हंसी में छिपा संदेश

कार्यक्रम के प्रमुख हास्य कवि दमदार बनारसी के अनुसार, इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य समाज में व्याप्त निराशा को दूर करना और लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाना है. उन्होंने कहा, “हम चाहते हैं कि लोग हंसें, खुश रहें और जीवन की जटिलताओं को कुछ समय के लिए भूल जाएं.”वहीं, स्थानीय निवासी कन्हैया दुबे ने इस सम्मेलन को बनारसी संस्कृति की पहचान बताते हुए कहा कि “ऐसी हास्य-व्यंग्य से भरपूर शाम दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलती. यह बनारस की मस्ती और मिजाज का सजीव प्रमाण है.”

दर्शकों की उत्साहपूर्ण प्रतिक्रिया

महामूर्ख सम्मेलन में शामिल दर्शकों ने बताया कि वे इस आयोजन का पूरे साल बेसब्री से इंतजार करते हैं. उनके अनुसार, यह सम्मेलन बनारस की आत्मा से जुड़ा हुआ है, जहां लोग बुद्धिमान बनने की दौड़ से अलग हटकर “मूर्खता का जश्न”, व्यंग्य और ठहाकों के साथ मनाते हैं. अगले वर्ष, यह अनोखा कारवां फिर उसी जोश और उत्साह के साथ काशी की गलियों में लौटेगा, और बनारसी अंदाज में हंसी का यह सिलसिला जारी रहेगा.

-भारत एक्सप्रेस 



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