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PoK की सियासत: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में क्यों है अलग प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और अपना झंडा?

POK POLITICS: पहली नजर में स्वतंत्र दिखने वाले PoK में क्यों है अलग प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और झंडा? जानिए भारत-पाक विभाजन से जुड़ी इसकी पूरी इनसाइड स्टोरी.

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पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर (PoK), जिसे पाकिस्तान कागजों पर ‘आजाद जम्मू-कश्मीर’ (AJK) कहता है, अपनी एक अलग और अनोखी राजनीतिक व्यवस्था के लिए जाना जाता है. अक्सर लोग यह देखकर हैरान होते हैं कि पाकिस्तान का हिस्सा होने के बावजूद इस क्षेत्र का अपना एक अलग झंडा है, अपनी विधानसभा है और यहां बकायदा एक राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री की नियुक्ति भी होती है. पहली नजर में यह व्यवस्था किसी स्वतंत्र या अर्ध-स्वायत्त (सेमी-ऑटोनॉमस) क्षेत्र जैसी लगती है, लेकिन कूटनीतिक विशेषज्ञों और आलोचकों का मानना है कि यह ‘आजादी’ केवल कागजों तक ही सीमित है.

1947 के विभाजन और इतिहास से जुड़ा है जवाब

इस अनोखी व्यवस्था को समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को पलटना होगा. साल 1947 में जब भारत और पाकिस्तान का विभाजन हुआ, तब जम्मू-कश्मीर एक स्वतंत्र रियासत थी और महाराजा हरि सिंह ने शुरुआत में किसी भी देश के साथ जाने का फैसला नहीं किया था. लेकिन अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान समर्थित कबायली लड़ाकों ने कश्मीर पर अवैध हमला बोल दिया. इसके बाद महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेसिबिलिटी’ (विलय पत्र) पर हस्ताक्षर कर दिए. भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई की, लेकिन जब युद्धविराम (सीजफायर) हुआ, तब कश्मीर का एक हिस्सा पाकिस्तान के अवैध कब्जे में रह गया, जिसे भारत आज ‘पीओके’ (PoK) कहता है.

पाकिस्तान ने इसे अपना प्रांत क्यों नहीं बनाया?

भारत का हमेशा से स्पष्ट और कड़ा रुख रहा है कि गिलगित-बाल्टिस्तान सहित पूरा PoK भारत का अभिन्न अंग है. पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मंचों (विशेषकर संयुक्त राष्ट्र) पर कश्मीर मुद्दे को जिंदा रखने और खुद को ‘कश्मीरियों का हमदर्द’ दिखाने के लिए इसे आधिकारिक तौर पर अपना प्रांत (जैसे पंजाब या सिंध) घोषित नहीं किया. इसके बजाय, उसने एक कूटनीतिक चाल चली और एक ऐसा प्रशासनिक ढांचा तैयार किया जिससे दुनिया को यह दिखाया जा सके कि यह एक स्वायत्त क्षेत्र है, जिसके पास अपनी सरकार, अदालते और अपना राष्ट्रीय झंडा है.

संविधान की धारा 370 से तुलना और अंतर

अक्सर PoK की तुलना भारत में जम्मू-कश्मीर को मिले पुराने आर्टिकल 370 से की जाती है, जिसके तहत पूर्व में जम्मू-कश्मीर का अपना संविधान और अलग झंडा था. हालांकि, दोनों व्यवस्थाओं में बहुत बड़ा अंतर था. भारत का आर्टिकल 370 भारतीय संविधान का एक हिस्सा था और जम्मू-कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय की एक संवैधानिक प्रक्रिया से जुड़ा हुआ था. इसके विपरीत, PoK की पूरी व्यवस्था पाकिस्तान द्वारा तैयार की गई एक महज प्रशासनिक और कूटनीतिक संरचना है, जिसका एकमात्र उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय विवादों के बीच इस क्षेत्र पर अपना अवैध नियंत्रण बनाए रखना है.

रावलपिंडी से चलती है असली हुकूमत

कागजों पर भले ही मुजफ्फराबाद में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति बैठते हों, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि PoK की वास्तविक शक्ति और नियंत्रण पूरी तरह से इस्लामाबाद और पाकिस्तान सेना (रॉवलपिंडी) के हाथों में सुरक्षित है. लंबे समय तक पाकिस्तान का प्रभाव ‘कश्मीर काउंसिल’ के जरिए चलाया जाता रहा, जिसकी अध्यक्षता खुद पाकिस्तान का प्रधानमंत्री करता है.

इतना ही नहीं, PoK की मुख्यधारा की राजनीति में भाग लेने के लिए नेताओं को पाकिस्तान के प्रति वफादारी की शपथ लेनी पड़ती है. वैकल्पिक या अलग राजनीतिक विचारों के लिए वहां कोई जगह नहीं है. यही वजह है कि वहां के स्थानीय लोग अक्सर बुनियादी अधिकारों, महंगाई और बिजली के बिलों को लेकर पाकिस्तान सरकार और सेना के खिलाफ सड़कों पर उतरकर भारी विद्रोह और प्रदर्शन करते रहते हैं.

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-भारत एक्सप्रेस



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