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अदालतों में AI के इस्तेमाल पर ड्राफ्ट नियम 2026: सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव देने की तारीख 15 जुलाई तक बढ़ाई

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय अदालतों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस्तेमाल से जुड़े ड्राफ्ट नियम 2026 पर जनता और वकीलों से सुझाव लेने की समय-सीमा 15 जुलाई तक बढ़ा दी है. विशेषज्ञों ने इसके इंफ्रास्ट्रक्चर और डेटा सुरक्षा को लेकर सतर्क किया है.

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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का इस्तेमाल सिर्फ टेक्नोलॉजी कंपनियों तक सीमित नहीं है. इसका इस्तेमाल न्यायपालिका में भी तेजी से हो रहा है. अदालतों में लंबित मामलों का बढ़ता बोझ, दस्तावेजों का विशाल ढेर और तेजी से न्याय देने की चुनौती के बीच एआई को एक संभावित समाधान के रूप में देखा जा रहा है. अदालत को आधुनिक बनाने और लंबित मामलों को कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 3 जून को अदालतों में एआई के इस्तेमाल के लिए ड्राफ्ट नियम 2026 जारी किया है. इसको सही ढंग से जोड़ने के लिए एक व्यवस्थित प्रणाली शुरू की गई है. इस पर 20 जून तक जनता, वकीलों और जजों से राय देने को कहा गया था, जिसे बढ़ाकर अब 15 जुलाई कर दिया गया है.

डेटा सुरक्षा पर विराग गुप्ता ने उठाए सवाल

इसको लेकर एआई एक्सपर्ट और सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता की मानें तो जिला अदालतों में पीने का पानी, शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं, फिर एआई के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर कैसे विकसित किया जाएगा. उन्होंने कहा कि भारत में अभी तक डेटा सुरक्षा से जुड़ा डीपीडीपी (DPDP) एक्ट 2023 कानून और उसके नियम लागू नहीं हैं. लंबित और पुराने मामलों में करोड़ों लोगों के संवेदनशील न्यायिक और सेंसिटिव पर्सनल डेटा का एआई के माध्यम से व्यावसायिक इस्तेमाल असंवैधानिक होगा. इसके लिए वादकारियों और वकीलों की स्पष्ट सहमति जरूरी है.

उन्होंने यह भी कहा है कि अनुच्छेद 145 के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के लिए 2013 में नियम बने थे. इसी तरह राज्यों की हाई कोर्ट्स में अनुच्छेद 225 और 227 के अनुसार नियम बनाए गए हैं. लेकिन एआई के मसौदे में यह नहीं लिखा कि कानून की किस प्राधिकृत व्यवस्था के अनुसार इन्हें देश की सभी अदालतों में लागू किया जाएगा?

जज नहीं बच सकते अपनी जिम्मेदारी से

इन नियमों में एआई को केवल एक सहायक उपकरण के रूप में परिभाषित किया गया है, जो इंसानी न्यायिक बुद्धि की जगह नहीं ले सकता. अगर एआई से कोई गलती होती है तो न्यायिक अधिकारी अपनी गलतियों के लिए एआई को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते हैं और ना ही अपनी जिम्मेदारी से बच सकते हैं. कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अब एआई सिर्फ एक सहायक उपकरण हो सकता है; अंतिम निर्णय लेने का अधिकार और जिम्मेदारी न्यायाधीशों के पास ही रहेगी.

मानवीय निगरानी रहेगी अनिवार्य

सुप्रीम कोर्ट के वकील सत्यार्थ बालाजी सिन्हा के अनुसार, एआई का न्यायपालिका में इस्तेमाल से लंबित मामलों में कमी देखने को मिलेगी, लेकिन इसका इस्तेमाल सावधानी से करना होगा. कई बार वकील एआई को सही जानकारी के लिए सही कंटेंट नहीं डालते हैं.

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एआई के इस्तेमाल की अनुमति कई तरह के कार्यों के लिए देते हैं, जिनमें केस प्रबंधन, सुनवाई की तारीखें तय करना, केस-लिस्ट तैयार करना, कार्यवाही की लिखित रिकॉर्डिंग (ट्रांसक्रिप्शन), कानूनी दस्तावेजों का अनुवाद, कानूनी शोध, संदर्भों की जांच, दस्तावेजों का सारांश तैयार करना, दिव्यांग व्यक्तियों के लिए सुलभता सेवाएं, फैसलों और अदालती रिकॉर्ड को अनाम (Anonymize) करना और प्रशासनिक कार्य शामिल हैं. हालांकि, इनमें से ज्यादातर कार्यों के लिए पहले से मंजूरी लेना और मानवीय निगरानी जरूरी होगी.

मानवीय संवेदनशीलता का विकल्प नहीं है तकनीक

इसको लेकर युवा वकील शौर्या तिवारी का मानना है कि युवा वकीलों को एआई का इस्तेमाल करते समय सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि कई बार एआई से ली गई जानकारी गलत भी हो जाती है. एआई की सबसे बड़ी चिंता यह है कि वह अपने प्रशिक्षण डेटा (Training Data) पर निर्भर करता है. यदि डेटा में पूर्वाग्रह है, तो एआई के परिणाम भी प्रभावित हो सकते हैं. एआई को लेकर कई बार न्यायाधीश सार्वजनिक मंचों पर कह चुके हैं कि एआई शोध और प्रशासनिक कार्यों में मददगार हो सकता है, लेकिन न्यायिक विवेक, मानवीय संवेदनशीलता और संवैधानिक मूल्यों का विकल्प नहीं बन सकता है.



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