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सजा हुई तो जाएगा मंत्री पद: अनुच्छेद 75, 164 और 239 AA में संशोधन की तैयारी; अदालत से लेकर संसद तक प्रयास जारी

राजनीति में अपराधीकरण रोकने के लिए सरकार 130वां संविधान संशोधन बिल ला रही है. जानें प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों की अयोग्यता से जुड़े नए नियमों और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बारे में

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राजनीति में अपराधीकरण को रोकने के लिए अदालत से लेकर संसद तक प्रयास किया जा रहा है. क्योंकि अभी तक सांसदों और विधायकों को दोषी करार देने या सजा होने पर अयोग्य करार देने का प्रावधान है, लेकिन प्रधानमंत्री, राज्यों के मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों के लिए ऐसा स्पष्ट प्रावधान नहीं है. सरकार 130वें संशोधन बिल के जरिए सजा का प्रावधान करने जा रही है, जिसको लेकर जेपीसी (JPC) की अहम बैठक है. 130वें संविधान संशोधन बिल में प्रावधान है कि अगर 5 साल या उससे अधिक सजा वाले संगीन अपराध में कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री 30 दिन तक हिरासत में रहता है, तो तुरंत उसका मंत्री पद छीन जाएगा.

अनुच्छेदों में संशोधन की आवश्यकता

वर्तमान संविधान में ऐसे किसी मंत्री को हटाने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जिसे गंभीर आपराधिक मामले में गिरफ्तार किया गया हो या हिरासत में रखा गया हो. इसी को देखते हुए संविधान के अनुच्छेद 75, 164 और 239 AA में संशोधन के लिए यह बिल लाया गया है. हालाँकि, सांसदों और विधायकों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने पहले से दिशा-निर्देश जारी किए हुए हैं, जिसके तहत 2 साल या उससे अधिक सजा होने पर वे अयोग्य हो जाते हैं और उनकी सदस्यता खत्म हो जाती है.

भ्रष्टाचार और जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा-8

भ्रष्टाचार सहित एक दर्जन ऐसे अपराध हैं, जिनमें सिर्फ दोषी ठहराए जाने पर ही व्यक्ति छह साल के लिए चुनाव लड़ने के अयोग्य हो जाता है, भले ही उसे एक भी दिन की जेल न होकर सिर्फ जुर्माने की सजा मिली हो. संविधान में जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 की उपधारा 1, 2 और 3 में उन अपराधों की सूची है, जिनमें दोषी ठहराए जाने पर व्यक्ति चुनाव लड़ने और सदन का सदस्य होने के अयोग्य हो जाता है. इसमें अयोग्यता की दो श्रेणियां हैं; एक में उन विशेष कानूनों का जिक्र है (जैसे भ्रष्टाचार निरोधक कानून), जिसमें दोषी पाए जाते ही व्यक्ति अयोग्य हो जाता है.

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आजीवन अयोग्यता की मांग

दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट आपराधिक मामलों में दोषी ठहराए गए सांसदों-विधायकों को आजीवन अयोग्य घोषित करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा है. यह याचिका सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से 2016 में दायर की गई थी. इसी मामले में कोर्ट ने वरिष्ठ वकील विजय हंसरिया को एमिकस क्यूरी नियुक्त किया है. पिछली सुनवाई में तीन जजों की बेंच ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि-

‘यदि एक सरकारी कर्मचारी रेप या हत्या के मामले में दोषी करार दिया जाता है, तो उसकी नौकरी स्थायी रूप से चली जाती है, लेकिन एमपी/एमएलए पर केवल 6 साल का प्रतिबंध लगाया जाता है.’

कानून की समीक्षा और वर्तमान विसंगतियां

कोर्ट ने कहा कि 6 साल के प्रतिबंध के बाद नेता दोबारा चुनाव लड़कर सांसद, विधायक या मंत्री बन सकता है, इसलिए जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 और 9 की जांच करनी पड़ेगी. वर्तमान कानून के तहत नेता रिहाई के छह साल बाद चुनाव लड़ने के लिए पात्र हो जाता है, भले ही उसे रेप जैसे जघन्य अपराधों या ड्रग्स, आतंकवाद और भ्रष्टाचार के मामले में दोषी ठहराया गया हो. यह याचिका राजनीति में शुचिता लाने और गंभीर अपराधियों को सदन से दूर रखने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है.



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