2020 के दिल्ली दंगों से संबंधित यूएपीए मामले में आरोपी शरजील ईमाम, गुलफिशा फातिमा सहित अन्य की ओर से दायर जमानत याचिका पर दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब दाखिल कर दिया है. दिल्ली पुलिस ने 189 पेज का हलफनामा दाखिल किया है.
दंगा स्वतः उपजा विरोध नहीं
दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि 2020 के दिल्ली दंगे ‘शासन परिवर्तन ऑपरेशन’ थे. दायर हलफनामा में आरोप लगाया गया है कि यह दंगा सत्ता परिवर्तन के लिए ऑपरेशन था. हलफनामे में यह भी कहा गया है कि दंगा स्वतः उपजा विरोध नहीं था, बल्कि भारत के आंतरिक सौहार्द और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को अस्थिर करने का सुनियोजित प्रयास था. इसके लिए पक्के सबूत मिले है.
हलफनामे में यह भी कहा गया है कि शरजील इमाम और उमर खालिद ने जानबूझकर ट्रायल में देरी की है. लिहाजा इन सबको जमनात नहीं मिलनी चाहिए. पुलिस ने कहा है कि संशोधित नागरिकता कानून के विरोध को हथियारों के जरिए भारत की अखंडता और संप्रभुता पर हमले की साजिश थी. हलफनामे में कहा गया है कि इस तरह का आचरण प्रक्रिया का बेशर्मी से दुरुपयोग है. साथ ही कहा गया है कि इन देरी ने न्याय प्रक्रिया में बाधा डाली है.
केस में कुल 17 लोगों को आरोपी
पिछली सुनवाई में जस्टिस अरविंद कुमार और एनवी अंजारिया की पीठ ने मामले में सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस की ओर से पेश वकील को फटकार लगाते हुए कहा पूछा था कि अभी तक जवाब दाखिल क्यों नहीं किया. कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि सभी जमानत मामलों में जवाब दाखिल करने का सवाल ही नहीं उठता. कोर्ट 31 अक्टूबर को अगली सुनवाई करेगा. सुप्रीम कोर्ट ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल से कहा था कि आप शायद पहली बार पेश हो रहे हैं, हमने पर्याप्त समय दिया है.
दिल्ली हाई कोर्ट ने शरजील इमाम सहित 9 आरोपियों को जमानत देने से इनकार कर दिया था. यह जमानत याचिका शरजील इमाम, उमर खालिद, मोहम्मद सलीम खान, शिफा उर रहमान, अतहर खान, मीरान हैदर, खालिद सैफी और गुलफिशा फातिमा ने दायर की थी. इसके अलावे केस में कुल 17 लोगों को आरोपी बनाया गया है, जिनमें ताहिर हुसैन, इशरत जहां, आसिफ इकबाल तन्हा, सैफुरा जरगर, फैजान खान, नताशा नारवाल और अन्य नाम शामिल है.
मुकदमे में देरी के आधार पर जमानत नहीं
मामले की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी थी, कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े यूएपीए मामलों में मुकदमे में देरी के आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती है. वही याचिककर्ताओ की ओर से पेश वकीलों ने कहा था कि मुकदमा लंबा खींच गया है और अभी तक आरोप भी तय नहीं हुए हैं. एसजी मेहता ने कहा था कि यह कोई सामान्य जमानत याचिका नहीं है, बल्कि सुनियोजित और संगठित दंगे का मामला है, जिसका उद्देश्य भारत की वैश्विक छवि को नुकसान पहुचाना था. उन्होंने आरोप लगाया जो इमाम और खालिद ने जानबूझकर उस दिन को चुना जिससे अशांति फैले और भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर बदनाम किया जा सके.
एसजी मेहता ने यह भी कहा था कि अगर कोई राष्ट्रविरोधी स्तर पर ऐसी हरकत करता है, तो उसे जमानत का कोई अधिकार नहीं है. उन्होंने यह भी कहा था कि दिल्ली दंगों की जांच अब तक कि सबसे बेहतरीन जांचों में भी एक है और धारा 164 के तहत 58 गवाहों के बयान दर्ज किए गए हैं. यह मामला फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगों से जुड़ा है, जिसमें 53 लोगों की मौत हुई और 700 से अधिक घायल हुए थे. दंगों में मारे गए लोगों में 38 मुस्लिम और 15 हिंदू थे.
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-भारत एक्सप्रेस
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