भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने कहा है कि न्याय तक पहुंच का मतलब केवल ऐसी व्यवस्था बनाना नहीं है, जहां अदालत या कानूनी संस्थानों तक पहुंच रखने वाले लोगों को ही न्याय मिल सके. असली चुनौती उन लोगों तक न्याय पहुंचाने की है, जो गरीबी, दूरी, भाषा, दिव्यांगता या कानूनी जानकारी की कमी के कारण व्यवस्था तक पहुंच नहीं पाते.
सीजेआई सूर्यकांत ने इंदौर में आयोजित नालसा (NALSA) की वेस्ट जोन रीजनल कॉन्फ्रेंस के उद्घाटन के दौरान यह बात कही. इस सम्मेलन की थीम ‘United Voice, Stronger Tomorrow’ रखी गई है.
सिर्फ कानून बनाना काफी नहीं
सीजेआई ने कहा कि न्याय तक पहुंच केवल कानून बनाने से सुनिश्चित नहीं होती. इसके लिए जरूरी है कि लोगों की बात सुनी जाए, उनके साथ सम्मान से व्यवहार किया जाए और कानूनी सहायता को समाज के आखिरी व्यक्ति तक पहुंचाया जाए.
उन्होंने कहा कि सम्मेलन की थीम सिर्फ एक नारा नहीं होनी चाहिए, बल्कि ऐसी कानूनी सहायता व्यवस्था की पहचान बननी चाहिए, जो वास्तव में जरूरतमंद लोगों तक पहुंचे. उनके मुताबिक न्याय तक पहुंच की शुरुआत बातचीत से होती है.
हर मामले के पीछे एक इंसान की समस्या
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि कानूनी सहायता के लिए आने वाला हर आवेदन किसी न किसी व्यक्ति की वास्तविक परेशानी से जुड़ा होता है. इसी तरह मध्यस्थता तभी सफल हो सकती है, जब दोनों पक्ष एक-दूसरे की बात सुनें.
उन्होंने कहा कि कानूनी जागरूकता कार्यक्रम भी तभी प्रभावी होंगे, जब संस्थाएं पहले उन लोगों की परिस्थितियों को समझें, जिनकी मदद करने का लक्ष्य है. नालसा में संवाद केवल बैठकों और सम्मेलनों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि राष्ट्रीय स्तर से लेकर राज्य, जिला और पैरालीगल वॉलंटियर तक लगातार जारी रहना चाहिए.
हर इलाके की जरूरत अलग
सीजेआई ने कहा कि पश्चिमी भारत के अलग-अलग हिस्सों में लोगों की कानूनी जरूरतें भी अलग हैं. मध्य प्रदेश के आदिवासी परिवारों, गोवा के मछुआरों, गुजरात के प्रवासी मजदूरों और मुंबई में कानूनी मदद मांगने वाली महिलाओं की समस्याएं एक जैसी नहीं हो सकतीं.
इसलिए कानूनी सहायता का तरीका भी सभी जगह एक जैसा नहीं हो सकता. इसे स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से और लोगों की समझ वाली भाषा में उपलब्ध कराना होगा, ताकि उनके मन में डर नहीं बल्कि भरोसा पैदा हो.
न्याय का अनुभव फैसला आने से पहले शुरू होता है
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि न्याय व्यवस्था को केवल इस आधार पर नहीं परखा जा सकता कि किसी व्यक्ति को राहत मिली या नहीं, मुआवजा मिला या नहीं या किसी आरोपी को दोषी ठहराया गया या बरी किया गया.
आम नागरिक के लिए न्याय का अनुभव अदालत का फैसला आने से काफी पहले शुरू हो जाता है. जब कोई व्यक्ति पहली बार लीगल एड क्लिनिक, कोर्ट परिसर या तालुका लीगल सर्विस अथॉरिटी के कार्यालय पहुंचता है, तभी से वह न्याय व्यवस्था को लेकर अपनी राय बनाना शुरू कर देता है.
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उन्होंने कहा कि ऐसे समय में उसकी बात धैर्य से सुनना, सरल भाषा में समझाना और सम्मान के साथ व्यवहार करना बेहद जरूरी है. सीजेआई के मुताबिक गरिमा केवल संविधान में लिखा सिद्धांत नहीं, बल्कि रोजमर्रा के व्यवहार में दिखाई देने वाली चीज है.
उन्होंने कहा कि कानूनी सहायता वकील का ध्यान से सुनना, पैरालीगल वॉलंटियर का आसान भाषा में कानून समझाना और न्यायिक अधिकारी का हर व्यक्ति के साथ सम्मान से पेश आना न्याय व्यवस्था में लोगों का भरोसा मजबूत करता है.
-भारत एक्सप्रेस
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