रैन बसेरों में सुविधाओं की कमी के मामले में लिए गए स्वतः संज्ञान पर दिल्ली हाई कोर्ट 16 जनवरी को सुनवाई करेगा. मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की पीठ ने कहा कि एक कल्याणकारी राज्य में यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह बेघर लोगों के साथ-साथ अस्पतालों में इलाज का इंतजार कर रहे मरीजों और उनके परिजनों को भी रहने की उचित व्यवस्था दे. कोर्ट ने यह भी कहा कि इसमें कोई भी एजेंसी या सरकार फंड या संसाधन कम होने का बहाना नही बनाएगी.
सरकार संसाधन की कमी का बहाना नहीं बना सकती- हाई कोर्ट
अदालत ने यह भी कहा कि ये लोग अपनी मर्जी से नहीं, बल्कि बेहतर चिकित्सा सुविधा की तलाश में मजबूर होकर अस्पतालों में जा रहे हैं. ऐसे में सरकार को अनुदान या किसी और संसाधन की कमी के कारण ऐसी सुविधाएं देने से मना करने की इजाजत नही दी जा सकती. कोर्ट ने कहा कि यह मामला बहुत ही गंभीर है, क्योंकि वह खुद की मर्जी से नहीं बल्कि मजबूरी की वजह से सड़क पर रात गुजार रहे हैं. ठंड के मौसम में किसी भी हालत में उन लोगों को सड़क पर छोड़ देना स्वीकार नहीं किया जा सकता है. अदालत ने कहा कि अगर सामाजिक कल्याणकारी देश में नागरिकों को पर्याप्त आश्रय का अधिकार नही दिया जाता है तो यह भारतीय संविधान के भाग 3 में निहित मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा.
अदालत ने आदेश दिया कि शाम तक जितना हो सके उतने बेड लगाए जाएं, जिससे मरीजों और उनके साथ आए लोगों को इतनी भयंकर ठंड से बचाया जा सके. साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि हॉस्पिटल के आसपास कोई और खाली जगह भी हो तो वहां भी लोगों के लिए रहने की व्यवस्था की जाए.
सुनवाई के दौरान डीयूएसआईबी के वकील ने बताया कि शहर में 300 से अधिक रैन बसेरे हैं, जिनकी कुल क्षमता लगभग 19000 लोगों की है. अदालत ने पूछा दो करोड़ से अधिक जनसंख्या वाले शहर में 19000 लोगों के लिए रैन बसेरे पर्याप्त होंगे.
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-भारत एक्सप्रेस
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