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कथावाचक अनिरुद्धाचार्य की बड़ी जीत; दिल्ली हाई कोर्ट ने सोशल मीडिया से आपत्तिजनक कंटेंट हटाने का दिया आदेश

दिल्ली हाई कोर्ट ने कथावाचक अनिल कुमार तिवारी उर्फ अनिरुद्धाचार्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए मेटा, एक्स और गूगल को सोशल मीडिया से आपत्तिजनक सामग्री हटाने का निर्देश दिया है.

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दिल्ली हाई कोर्ट ने कथावाचक अनिल कुमार तिवारी उर्फ अनिरुद्धाचार्य की ओर से दायर व्यक्तित्व सुरक्षा की मांग वाली याचिका पर आदेश पारित कर दिया है. हाई कोर्ट ने मेटा, एक्स और गूगल को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से आपत्तिजनक सामग्री को हटाने का आदेश दिया है.

जस्टिस तुषार राव गेडेला ने कहा कि यह स्पष्ट है कि इस प्रकार के लिंक की प्रकृति यह संकेत नहीं देती कि वे केवल पैरोडी हैं. साथ ही कोर्ट ने कहा वादी का प्रथम दृष्टया मामला मजबूत है. साथ ही उसकी सुप्रसिद्ध, लोकप्रिय और सर्वमान्य शख्सियत को देखते हुए मामला अनिरुद्धाचार्य के पक्ष में दिख रहा है. कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में याचिकाकर्ता की छवि और व्यक्तित्व को धूमिल होने और क्षति पहुचने की आशंका पहली नजर में सही प्रतीत दिखाई दे रहा है. इससे पहले कोर्ट ने कहा था कि यह इसमें अंतरिम आदेश पारित करेगा.

अनिरुद्धाचार्य ने व्यक्तित्व सुरक्षा की मांग को लेकर याचिका दायर की है.

याचिका में प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचने की आशंका जताई गई

दायर याचिका में कहा गया है कि उनकी पहचान, उनकी आवाज, नाम और छवि का उनके बिना अनुमति के इस्तेमाल करने पर रोक लगाए. क्यों कि इससे उनकी छवि को नुकसान पहुच रहा है. पिछली सुनवाई में कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि ‘हमें तो बस दिल्ली के लिए यह प्यार समझना है’. कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा था कि दिल्ली के प्रति इतना प्रेम क्यों, जब देशभर में और अदालतें उपलब्ध है, और आदेश पारित कर रही हैं.

इसपर वकील ने कोर्ट को बताया था कि उनके ज्यादातर दर्शक दिल्ली में हैं, तो कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि आपका कंटेंट तो मंगल और बृहस्पति पर भी पहुच सकता है, सवाल यह है कि यहां कौन देख रहा है? इसपर कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि सिर्फ सुविधा के नाम पर सूट फाइल नहीं हो सकता.

जस्टिस गेडेला ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि एक धार्मिक गुरु होने के नाते आपको आलोचना और प्रशंसा से ऊपर होना चाहिए. उन्होंने कहा था कि जब आप कोई विचार रखते है, तो असहमति होना स्वाभाविक है. उदाहरण देते हुए कोर्ट ने कहा था कि आदि शंकराचार्य भी मतभेद होने पर मुकदमें नही करते थे, बल्कि बहस के जरिये अपनी बात रखते थे. आपको आलोचना से ऊपर उठना चाहिए, प्रतिष्ठा से आसक्ति क्यों? कोर्ट ने कहा था कि दार्शनिक विचारों से असहमति होना स्वाभाविक है, लेकिन हर बात को मानना जरूरी नही है.

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-भारत एक्सप्रेस



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