दिल्ली हाई कोर्ट ने जजों के लिए फ्लैटों के निर्माण में कोई प्रगति नहीं होने पर दिल्ली सरकार और दिल्ली विकास प्राधिकरण को फटकार लगाई है. मुख्य न्यायाधीश दिनेश कुमार उपाध्याय एवं जस्टिस तुषार राव गेडेला की पीठ ने कहा कि उसने इसके लिए डीडीए से अनुरोध किया था, लेकिन उसकी बात अनसुनी कर दी गई.
अदालत ने कहा कि सरकारी अधिकारियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे जजों के सभ्य जीवन शैली की जरूरतों को समझें और इसे संवेदनशीलता के साथ देखे. लेकिन हमें भीख मांगनी पड़ती है. हमें शून्य में मत खड़ा करें, सुनिश्चित करें अन्यथा ये मीठे लगने वाले शब्द काम नहीं आएंगे. वह अधिकारियों को बुलाने से चूक गया. हर विभाग उसकी धैर्य की परीक्षा ले रहा है.
यह केंद्र सरकार और राज्य सरकार दोनों के लिए है. सभी विभागों और अधिकारियों को इस बारे में अवगत कराएं. उन्हें इस तरह से अदालत के धैर्य परीक्षा नहीं लेनी चाहिए. अदालत ने जजों के लिए द्वारका में सरकारी आवास बनाने को लेकर राशि जारी करने के लिए सरकार को तीन सप्ताह का समय दे दिया है.
कमी को लेकर दिल्ली सरकार की खिंचाई की थी
साथ ही डीडीए आयुक्त को अदालती आदेशों का पालन करने को लेकर उठाए गए कदम का संकेत देते हुए हलफनामा दाखिल करने को कहा है. उस हलफनामे में जजों के लिए वैकल्पिक फ्लैटों के बारे में भी बताने को कहा है. उसने डीडीए निदेशक को मई में होने वाली सुनवाई में उपस्थित रहने को भी कहा है.
कोर्ट ने पिछले महीने जजों के लिए आवासीय फ्लैटों के निर्माण की लंबित परियोजनाओं के लिए राशि उपलब्ध कराने के प्रयासों में कमी को लेकर दिल्ली सरकार की खिंचाई की थी. उसने सरकार को याद दिलाया जजों के लिए पर्याप्त आवास उपलब्ध कराना सभी की प्राथमिकता होनी चाहिए.
इससे पहले कोर्ट को सूचित किया गया था कि जजों की कुल स्वीकृत संख्या 897 के मुकाबले उपलब्ध फ्लैटों की संख्या 348 है. यह कई जगहों पर है और 549 फ्लैटों की कमी है. जजों को सरकारी आवास मुहैया कराने की मांग करते हुए साहिल ए गर्ग ने याचिका दाखिल की है. जिस याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट सुनवाई कर रहा है.
-भारत एक्सप्रेस
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