मानहानि के मामले में दिल्ली के उपराज्यपाल वी. के सक्सेना को दिल्ली के साकेत कोर्ट से बड़ी राहत मिल गई है. समाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने उपराज्यपाल के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया था. साकेत कोर्ट के न्यायिक मजिस्ट्रेट राघव शर्मा ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोप साबित नहीं होता है. इससे पहले साकेत कोर्ट ने मेधा पाटकर को बरी कर दिया था.
यह मामला 2006 में एक टेलीविजन कार्यक्रम के दौरान उनके द्वारा की गई टिप्पणियों से.संबंधित था. अदालत ने कहा कि सक्सेना कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों को रिकॉर्ड करने वाले मूल रिकॉर्डिंग उपकरण या संपूर्ण वीडियो फुटेज को प्रस्तुत करने में विफल रहे. बता दें कि मेधा पाटकर के खिलाफ दिल्ली के उप राज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने पाटकर के खिलाफ 25 नवंबर 2000 को अहमदाबाद की एक अदालत में मानहानि का शिकायत किया था और उसमें पाटकर की एक प्रेस नोट का हवाला दिया था.
अदालत ने आरोपों को खारिज किया
प्रेस नोट देशभक्त का असली चेहरा शीर्षक से था और उसमें कहा गया था कि हवाला लेन देन से दुखी वीके सक्सेना खुद मालेगांव आये. एनबीए की तारीफ की और 40 हजार रुपए का चेक दिया. लेकिन चेक भुनाया नहीं जा सका और बाउंस हो गया. जांच करने पर बैंक ने बताया कि खाता मौजूद ही नही है. मेधा पाटकर ने यह भी कहा था कि सक्सेना कायर है, देशभक्त नहीं. अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि मेधा पाटकर की हरकतें जानबूझकर और दुर्भाग्यपूर्ण थी, जिसका उद्देश्य सक्सेना की छबि को धूमिल करना था.
इससे उनकी छवि और साख को काफी नुकसान पहुचा है. उनके लगाए गए आरोपी भी न केवल मानहानिकारक है, बल्कि नकारात्मक धारणाओं को भड़काने के लिए भी गढ़े हुए है. इसके अलावा यब आरोप था कि शिकायतकर्ता गुजरात के लोगों और उनके संसाधनों को विदेशी हितों के लिए गिरवी रखा रहा है. यह उनकी ईमानदारी और सार्वजनिक सेवा पर सीधा हमला है.
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-भारत एक्सप्रेस
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