सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस बी.आर. गवई ने आज श्रीलंका के कोलंबो में एक महत्वपूर्ण व्याख्यान देते हुए स्पष्ट किया कि एक सच्चे लोकतंत्र में न तो संसद सर्वोच्च होती है और न ही न्यायपालिका. उन्होंने जोर देकर कहा कि सबसे ऊपर केवल ‘संविधान’ होता है. जस्टिस गवई कोलंबो विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र संघ द्वारा आयोजित ’19वें सुजाता जयवर्धने मेमोरियल ओरेशन’ को संबोधित कर रहे थे.
संसद की शक्तियों की सीमाएं
जस्टिस गवई ने “क्या एक सच्चे लोकतंत्र में संसद सर्वोच्च है?” विषय पर बोलते हुए कहा कि अक्सर यह भ्रम होता है कि जनता द्वारा चुनी गई संसद कुछ भी कर सकती है. उन्होंने ब्रिटेन के उदाहरण से समझाया कि वहाँ संसद की सर्वोच्चता का सिद्धांत चलता है क्योंकि वहाँ लिखित संविधान नहीं है. लेकिन भारत और श्रीलंका जैसे देशों में, जहाँ लिखित संविधान है, वहाँ संसद की शक्तियाँ संविधान द्वारा तय की गई सीमाओं के भीतर ही काम करती हैं. संसद कानून बना सकती है, लेकिन वह संविधान की मूल भावना को नहीं बदल सकती.
संविधान: पावर का मुख्य सोर्स
जस्टिस गवई ने अपने भाषण में डॉ. बी.आर. अंबेडकर के विचारों का उल्लेख किया. उन्होंने बताया कि संविधान राज्य के तीन अंगों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका-को शक्ति प्रदान करता है. ये तीनों अंग अपने-अपने क्षेत्र में स्वतंत्र हैं, लेकिन इनमें से कोई भी ‘निरंकुश’ नहीं हो सकता. यदि संसद कोई ऐसा कानून बनाती है जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन करता है, तो न्यायपालिका के पास उसे रद्द करने का अधिकार है. इसी तरह, न्यायपालिका को भी अपनी सीमाओं का ध्यान रखना चाहिए ताकि वह ‘न्यायिक अतिरेक’ (Judicial Overreach) का शिकार न हो.
केशवानंद भारती केस और ‘मूल संरचना’ का सिद्धांत
भारतीय संवैधानिक इतिहास का जिक्र करते हुए न्यायमूर्ति ने 1973 के प्रसिद्ध ‘केशवानंद भारती’ मामले की चर्चा की. उन्होंने बताया कि इसी फैसले ने ‘बुनियादी ढांचे’ (Basic Structure Doctrine) के सिद्धांत को जन्म दिया. इस सिद्धांत के अनुसार, संसद के पास संविधान में संशोधन करने की शक्ति तो है, लेकिन वह इसके बुनियादी ढांचे (जैसे लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और न्यायपालिका की स्वतंत्रता) को नष्ट नहीं कर सकती. यह सिद्धांत लोकतंत्र की रक्षा के लिए एक ढाल की तरह काम करता है.
1975 के आपातकाल के दौरान मिली सीख और सुधार
भाषण के दौरान जस्टिस गवई ने 1975 के आपातकाल का भी जिक्र किया. उन्होंने ईमानदारी से स्वीकार किया कि उस दौर में संस्थागत संतुलन बिगड़ गया था और न्यायपालिका भी अपनी जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह सफल नहीं रही थी. हालांकि, उन्होंने यह भी बताया कि लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि इसमें सुधार की गुंजाइश होती है. बाद में संसद ने 44वें संशोधन के जरिए और न्यायपालिका ने अपने फैसलों के जरिए उन गलतियों को सुधारा, जिससे नागरिकों की स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार को फिर से मजबूती मिली.
श्रीलंका का संवैधानिक सफर
जस्टिस गवई ने श्रीलंका के संवैधानिक बदलावों पर भी बात की. उन्होंने 17वें से लेकर 21वें संशोधन तक के सफर का जिक्र करते हुए बताया कि कैसे श्रीलंका ने सत्ता के केंद्रीकरण और विकेंद्रीकरण के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है. उन्होंने कहा कि श्रीलंका का अनुभव भी यही सिखाता है कि जब भी किसी एक संस्था के पास बहुत अधिक शक्ति आ जाती है, तो जवाबदेही कम होने लगती है, जो लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है.
शिक्षा और न्याय के लिए सहयोग
जस्टिस गवई ने कुछ ऐसे उदाहरण भी दिए जहाँ संसद और न्यायपालिका ने मिलकर काम किया है. उन्होंने ‘शिक्षा के अधिकार’ (Right to Education) का उदाहरण देते हुए कहा कि पहले सुप्रीम कोर्ट ने इसे जीवन के अधिकार का हिस्सा माना और बाद में संसद ने इसे कानून बनाकर धरातल पर उतारा. इसी तरह कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ ‘विशाखा गाइडलाइंस’ को बाद में संसद ने कानून का रूप दिया. यह दिखाता है कि जब संस्थाएं मिलकर काम करती हैं, तो समाज का भला होता है.
अपने संबोधन के अंत में जस्टिस गवई ने कहा कि लोकतंत्र में संस्थाओं के बीच थोड़ा तनाव होना स्वाभाविक है और यह लोकतंत्र के जीवित होने का प्रमाण भी है. उन्होंने स्पष्ट किया कि अंततः शक्ति का अंतिम स्रोत जनता और उसका रक्षक संविधान है. सभी सरकारी अंगों को संविधान की मर्यादा के भीतर रहकर ही काम करना चाहिए, तभी एक स्वस्थ लोकतंत्र फलता-फूलता है.
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.


