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‘मीम्स और विरोध पर FIR से बर्बाद हो रहा कोर्ट का समय’, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने पुलिस और यूएपीए के दुरुपयोग पर जताई चिंता

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने यूएपीए (UAPA) के तहत लगातार की जा रही गिरफ्तारीयों पर गंभीर चिंता जताई है.

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने यूएपीए के तहत हो रही लगातार गिरफ्तारियों को लेकर चिंता व्यक्त की है. उन्होंने कहा कि असहमति को अपराध घोषित करने, आतंकवाद रोधी कानून यूएपीए के तहत की जा रही लगातार गिरफ्तारियां और गहरी सामाजिक दरारों के माध्यम से 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य हासिल नही किया जा सकता है.

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने यह टिप्पणी रविवार को बेंगलुरू में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान कही है. उन्होंने हाई कोर्ट में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व पर भी चिंता जाहिर की है. उन्होंने इसकी तुलना देश भर में जिला न्यायपालिका में न्यायिक अधिकारियों के पदों पर 50 फीसदी से अधिक महिलाओं की नियुक्ति से की.

यूएपीए को लेकर उन्होंने कहा कि यूएपीए के तहत सजा के कम दर इस बात का संकेत है कि कानून का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है.

यूएपीए के 95% से ज्यादा मामलों में लोग बरी

यूएपीए के तहत गिरफ्तार किए गए लोगों के 2019 से 2023 तक के आंकड़े पेश करते हुए उन्होंने कहा कि हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया है. लेकिन सजा की औसत दर्च लगभग 5 फीसदी ही रही है. यह लगातर कम सजा की दर को दर्शाता है. उन्होंने संकेत दिया कि कई गिरफ्तारियां समय से पहले की गई थी और उनके समर्थन में पर्याप्त सबूत नहीं थे. जब सजा की सामान्य दर्च पांच फीसदी या उससे भी कम है और यूएपीए के 95 फीसदी से ज्यादा मामलों में लोग बरी हो जाते हैं, तो किसी आरोपी को उसके खिलाफ चार्जशीट दाखिल किए बिना ही जेल में क्यों रखा जाना चाहिए? यह विकसित भारत का मॉडल नही हो सकता.

पुलिस की लंबी जांच से न्यायपालिका का कीमती समय बर्बाद

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने अदालतों में लंबित मुकदमों के अंबार पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इसके पीछे बेतुकी अपीलों और बेबुनियाद एफआईआर को बड़ी वजह बताया है. जस्टिस भुइयां ने कहा कि हाल के दिनों में आपराधिक मामलों और एफआईआर बहुत ही लापरवाही से दर्ज किए जा रहे है. छात्रों के प्रदर्शन, सार्वजनिक आंदोलनों और यहां तक कि सोशल मीडिया पर शेयर किए गए मिम्स या पोस्ट जैसी छोटी-छोटी बातों पर भी तुरंत एफआईआर दर्ज कर ली जाती है.

इसके बाद पुलिस की लंबी जांच चलती है और जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचाता है, तो एसआईटी के गठन की मांग की जाती है.  इससे न्यायपालिका की बहुत कीमती समय बर्बाद हो जाता है.

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-भारत एक्सप्रेस



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