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अमित शाह ने किया तुषार मेहता की किताबों का विमोचन; बोले- ‘न्यायपालिका और कार्यपालिका का संतुलन ही लोकतंत्र की शक्ति’

CJI Surya Kant: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की नई पुस्तकें ‘द बेंच, द बार, एंड द बिज़ार’ और ‘द लौफुल एंड द अवफुल’ कानूनी जगत के गंभीर वातावरण में हास्य और मानवीय पहलुओं का एक अनूठा संगम पेश करती हैं.

Amit Shah
Edited by Shubhra Rai

The Bench the Bar and the Bazaar: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दो नई किताबों का भव्य विमोचन गृह मंत्री अमित शाह और न्यायिक दिग्गजों की उपस्थिति में हुआ. ये पुस्तकें कानून की गंभीर मर्यादाओं के बीच छिपे हास्य और दिलचस्प किस्सों का अनूठा संग्रह हैं.

तुषार मेहता ने ‘द बेंच, द बार, एंड द बिज़ार’ के जरिए कोर्ट रूम की गंभीर दुनिया को मजाकिया और मानवीय दृष्टिकोण से दिखाया है. किताबों में जजों के व्यवहार, वकीलों की औपचारिक लाचारी और न्यायपालिका की ‘बुली’ संस्कृति पर बेबाक कटाक्ष किया गया है. जिसके बाद अमित शाह और सीजेआई ने इन रचनाओं की सराहना करते हुए इसे न्यायिक परंपराओं और संस्थागत संतुलन को समझने का एक नया जरिया बताया।

कानून की गंभीर दुनिया को हास्य का रंग दिया

केंद्र सरकार का पक्ष रखने वाले सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता अपनी किताब को लेकर सुर्खियों में है. उनके द्वारा लिखी गई किताब द बेंच, द बार, एंड द बिज़ार और द लौफुल एंड द अवफुल का केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विमोचन किया. इस दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल, अटॉर्नी जनरल आर वैंकटमनी के अलावे सुप्रीम कोर्ट के कई जज, भूटान के जज, कई हाई कोर्ट्स के जज और वरिष्ठ वकील मौजूद थे.

सीजेआई सूर्यकांत ने तुषार मेहता की किताबों ‘द बेंच, द बार, एंड द बिज़ार और द लौफुल एंड द अवफुल’ के लोकार्पण के दौरान कहा कि इन पुस्तकों ने कानून की गंभीर दुनिया को हास्य का रंग दिया है.

कोर्ट नंबर 1 में सुनवाई के दौरान ही लेखन कर लिया

उन्होंने मजाकिया लहजे में कहा कि यह समझना मुश्किल है कि भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता अपनी व्यस्त दिनचर्या के बीच इन किताबों को लिखने का समय कैसे निकाल पाए. शायद उन्होंने दिन में 25वां घंटा खोज लिया हो, या फिर कोर्ट नंबर 1 में सुनवाई के दौरान ही लेखन कर लिया हो.

उन्होंने कहा कि अदालतों के गंभीर माहौल के बीच छिपे हास्य को सामने लाते हुए तुषार मेहता ने यह दिखाया है कि कानून सिर्फ आदेशों और आपत्तियों का संसार नहीं, बल्कि उसमें मानवीय भावनाएं, कमजोरियां और कई बार अनायास उपजने वाली कमेडी भी शामिल होती है.

असीम बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता से लिखा गया

सीजेआई ने कहा कि तुषार मेहता की अगली किताब शायद भारतीय न्यायपालिका की ऐसी ही कहानियों पर होनी चाहिए, क्योंकि यहां भी हास्य और दिलचस्प घटनाओं की कोई कमी नहीं है. उन्होंने कहा कि इन किताबों की खासियत सिर्फ उनका हास्य नहीं, बल्कि उनके पीछे किया गया गहरा शोध भी है.

जबकि समारोह में मौजूद मुख्य अतिथि व केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने आगे कहा कि निःसंदेह हमारा संविधान असीम बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता से लिखा गया था और जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं, तो मुझे लगता है कि इन 76 वर्षों में बहुत कम देशों ने संवैधानिक मर्यादाओं और संस्थागत सीमाओं का इस प्रकार पालन करते हुए प्रगति की है, जैसा कि भारत ने किया है.

यह हम सभी के लिए अत्यंत संतोष की बात है कि हमारे देश में संवैधानिक मानदंड और संस्थागत मर्यादाएं अक्षुण्ण बनी हुई हैं, और परंपराओं और रीति-रिवाजों के माध्यम से हमने इन्हें और भी मजबूत किया है. लोकतंत्र की शक्ति टकराव से नहीं, बल्कि संस्थागत संतुलन और आपसी सम्मान से आती है और जब मैं आपसी सम्मान की बात करता हूं, तो हमारा संविधान स्वयं कई रूपों में इसका साक्षी है और हम सभी ने इसे देखा भी है.

हमें भविष्य में भी इस भावना को बनाए रखना चाहिए.

जजों के रवैये पर कई सवाल खड़े किए

कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन बनाए रखने की जो स्वस्थ प्रथा पिछले 75 वर्षों में विकसित हुई है, उसे और मजबूत किया जाना चाहिए और हम सभी को मिलकर इसे आगे बढ़ाना चाहिए. आज मैं यहां विधि क्षेत्र पर टिप्पणी करने नहीं आया हूं. हालांकि मैंने एक बात पक्की कर ली है कि निकट भविष्य में किसी न किसी मंच पर मैं इन मुद्दों पर अपने विचार जरूर रखूंगा.

मैं आज यह बात स्पष्ट रूप से कह रहा हूं. एसजी मेहता की इस किताब में जजों के रवैये पर कई सवाल खड़े किए हैं.

जजों के भीतर देवत्व का झूठा अहसास भर दिया

उन्होंने किताब में दुनिया के वकीलों की तरफ से जजों के लिए जताई जाने वाली श्रद्धा को लेकर कई प्रश्न खड़े किए है. मेहता का तर्क है कि वकीलों द्वारा जजों के प्रति दिखाए जाने वाले अत्यधिक सम्मान ने कुछ जजों के भीतर देवत्व का झूठा अहसास भर दिया है. उनके अनुसार इसी भावना के कारण कुछ जज अदालतों में दबंग या बुली में तब्दील हो गए हैं.

तुषार मेहता ने विदेशी अदालतों की घटनाओं का जिक्र करते हुए बेंच पर दादागिरी वाली थीम को समझाया है, जो भारतीय न्यायपालिका को भी आईना दिखा सकती है.

जज की बात को गलत नहीं कह सकता

उन्होंने अदालतों में इस्तेमाल होने वाली औपचारिक भाषा पर भी कटाक्ष किया है. उन्होंने बताया कि कैसे एक वकील को स्पष्ट कानूनी विसंगति दिखने पर भी झुककर मिलॉर्ड कहना पड़ता है. वकील सीधे तौर पर जज की बात को गलत नहीं कह सकता, बल्कि उसे हुजूर की दयालू अनुमति के साथ एक वैकल्पिक प्रस्ताव पेश करने की स्वतंत्रता मांगनी पड़ती है.

मेहता ने लिखा है कि कुछ जज वकीलों की बात लगातार काटते रहते है, तो कुछ सख्ती की हद पार करके अपमान करने पर उतर आते हैं. एसजी मेहता का कार्यकाल एसजी के तौर पर लगभग 8 साल का है, जो 2018 में शुरू हुआ था. पहले एसजी रहे दिग्गज सी. के दफ्तरी के 13 साल के कार्यकाल के बाद यह दूसरा सबसे लंबा कार्यकाल है.

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-भारत एक्सप्रेस 



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